नेपाल के बाढ़ के बाद भारत से नुकसान का मुआवजा मांगे जाने की खबरों के बीच नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने बड़ा स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि नेपाल ने भारत से किसी भी तरह के आर्थिक मुआवजे की मांग नहीं की है। खनाल ने साफ कहा कि न तो उन्होंने और न ही नेपाल के विदेश मंत्रालय या सरकार के किसी व्यक्ति ने भारत, चीन या अमेरिका से मुआवजा मांगा है।
फिर नेपाल की असली मांग क्या है?
खनाल के मुताबिक नेपाल की अपील मुआवजे के बजाय जलवायु परिवर्तन के असर को समझने और उस पर मिलकर काम करने की है। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में भारत, नेपाल और चीन की पर्यावरणीय स्थिति एक-दूसरे से जुड़ी हुई है और तीनों देश बढ़ते तापमान तथा जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में उनका जोर इस बात पर है कि क्षेत्रीय देश बेहतर तैयारी करें और दुनिया के दूसरे देश भी नेपाल जैसे छोटे देशों की मदद के लिए आगे आएं।
भारत ने नेपाल के लिए क्या-क्या मदद भेजी?
नेपाल के विदेश मंत्री ने आपदा के तुरंत बाद भारत की राहत और बचाव कोशिशों की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत शुरुआती दौर से ही काठमांडू के संपर्क में रहा और उसने जरूरत के मुताबिक हर तरह की मदद देने की पेशकश की। भारत की ओर से राहत सामग्री, बचाव उपकरण, अस्थायी पुल से जुड़े सामान, पानी निकालने वाली मशीनें और अन्य जरूरी सामग्री भेजी गई। इसके अलावा चिकित्सा सामान, जनरेटर, सौर लैंप, टेंट और पानी साफ करने वाली इकाइयां भी नेपाल भेजी गईं।
भारत ने कितनी राहत सामग्री नेपाल भेजी?
भारत का पहला राहत विमान 26 अगस्त को नेपाल पहुंचा था, जिसमें 10 टन सामान था। इसमें अस्थायी आश्रय, कंबल, स्वच्छता किट, सौर लैंप और दवाएं शामिल थीं। इसके बाद 27 अगस्त को दूसरी खेप में 37.5 टन राहत सामग्री भेजी गई। इसमें टेंट, कंबल, स्वच्छता किट, सौर लैंप, पानी निकालने वाले पंप, रसोई का सामान, जनरेटर, दवाएं और खाद्य सामग्री शामिल थी। इसके बाद 10 टन की एक और खेप भेजी गई। भारत ने बुधवार को 11 सदस्यीय बचाव दल, विशेष उपकरण और 5.5 टन जरूरी दवाओं के साथ पांचवां विमान भी भेजा।
फोरेंसिक मदद को लेकर दोनों देशों में क्या सहयोग हो रहा है?
भारत ने राहत और बचाव के साथ फोरेंसिक सहायता भी उपलब्ध कराई है। नेपाल में बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने के बाद शवों की पहचान एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। खनाल ने कहा कि भारत ने इस दिशा में भी सहयोग दिया है। उन्होंने बताया कि दोनों सरकारों के बीच जरूरत के अनुसार लगातार बातचीत हो रही है। नेपाल की ओर से जब भी नई जरूरत सामने आती है, भारत को इसकी जानकारी दी जाती है और नई दिल्ली सहायता के लिए तैयार रहती है।
कितनी तबाही हुई है और आगे क्या चुनौती है?
नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, गुरुवार शाम सात बजे तक रासुवा में आई विनाशकारी बाढ़ से मरने वालों की संख्या 1,282 पहुंच गई थी। इस आपदा ने नेपाल के उत्तरी और मध्य हिस्सों में भारी तबाही मचाई है। खनाल ने कहा कि अब जरूरत केवल तत्काल राहत तक सीमित रहने की नहीं है। बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली ऐसी आपदाओं के लिए लंबे समय की तैयारी जरूरी है। उन्होंने क्षेत्रीय सहयोग को नेपाल की सुरक्षा, संस्कृति, विरासत और भविष्य के लिए अहम बताया।