क्या जाली नेपाली नागरिकता से विदेशी भारत में दाखिल हुए?
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नेपाल में 15 साल पहले विदेश मंत्रालय के स्टोर से गायब हुए 500 खाली यात्रा दस्तावेजों की दोबारा जांच ने भारत और नेपाल से जुड़े दस्तावेज जालसाजी के एक कथित नेटवर्क पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जांच में आशंका जताई गई है कि इस नेटवर्क के जरिए विदेशी नागरिकों और शरणार्थियों के लिए जाली नेपाली नागरिकता प्रमाणपत्र तैयार किए जाते थे। इसके बाद इन्हीं प्रमाणपत्रों के आधार पर नेपाली पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज हासिल किए जाते थे। भारत-नेपाल की खुली सीमा और दोनों देशों के बीच वीजा-मुक्त आवाजाही को देखते हुए इस मामले का सुरक्षा पहलू भी महत्वपूर्ण हो गया है।
500 दस्तावेज गायब होने का मामला फिर क्यों खुला?
नेपाल विदेश मंत्रालय से वर्ष 2009 में ए-026001 से ए-026500 श्रृंखला के 500 खाली यात्रा दस्तावेज गायब हुए थे। इनमें से अब तक केवल तीन दस्तावेज बरामद किए जा सके हैं। बाकी 497 दस्तावेजों का कोई पता नहीं चला है। मामले की दोबारा जांच नेपाल पुलिस के केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीआईबी को सौंपी गई है। जांच के दौरान मंत्रालय के पूर्व अधिकारी बचराम केसी को गिरफ्तार किया गया है। उनके बयान को जांच में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वरिष्ठ राजनयिकों के बयान भी दर्ज किए गए हैं। इतने वर्षों बाद दोबारा शुरू हुई जांच का मुख्य सवाल यही है कि इतने संवेदनशील दस्तावेज आखिर किसके हाथ लगे और उनका इस्तेमाल कहां किया गया।
जाली नागरिकता से असली पासपोर्ट तक कैसे पहुंचते थे?
- जांच में सामने आए आरोपों के अनुसार कथित सिंडिकेट भारत-नेपाल सीमा से लगे जिलों में सक्रिय था। नेटवर्क के सदस्य विदेशी नागरिकों या अवैध रूप से रह रहे लोगों के लिए जाली नेपाली नागरिकता प्रमाणपत्र तैयार करवाते थे। इसके बाद इसी पहचान के आधार पर नेपाली पासपोर्ट और दूसरे यात्रा दस्तावेज हासिल करने का रास्ता तैयार किया जाता था।
- इस पूरी प्रक्रिया में दोनों देशों में मौजूद दलालों के समन्वित नेटवर्क की बात सामने आई है। गिरफ्तार पूर्व अधिकारी केसी के बयान के मुताबिक भारत और नेपाल में दलालों का एक संगठित तंत्र काम कर रहा था। हालांकि, इस नेटवर्क से जुड़े सभी आरोपों और इसकी पूरी संरचना की जांच अभी जारी है।
एक दस्तावेज के लिए कितने पैसे वसूलने का आरोप है?
जांच में कथित नेटवर्क के विदेशी नागरिकों से प्रति व्यक्ति करीब 5,000 अमेरिकी डॉलर वसूलने की बात सामने आई है। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब चार से सवा चार लाख रुपये के आसपास बैठती है। रिपोर्ट के अनुसार इस नेटवर्क में मुख्य रूप से अफगान और तिब्बती शरणार्थियों के शामिल होने की आशंका जताई गई है। साथ ही अफगानिस्तान से आए लोगों के इस जालसाजी नेटवर्क के जरिए आवाजाही करने की आशंका से भी इनकार नहीं किया गया है। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि गायब हुए यात्रा दस्तावेजों में से कितने का इस्तेमाल किया गया और किन लोगों को इन दस्तावेजों के जरिए नेपाल की पहचान या यात्रा संबंधी कागजात हासिल हुए।
भारत के लिए यह मामला सुरक्षा के लिहाज से क्यों अहम है?
भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा होने के कारण इस मामले का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं माना जा रहा है। दोनों देशों के नागरिकों के बीच वीजा-मुक्त आवाजाही होती है। ऐसे में अगर किसी विदेशी नागरिक ने जाली नेपाली पहचान और असली यात्रा दस्तावेज हासिल कर लिए हों तो उसके भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करने या भारत के रास्ते किसी तीसरे देश जाने की आशंका गंभीर सुरक्षा सवाल खड़े करती है। खासतौर पर 500 दस्तावेजों में से 497 के अब तक नहीं मिलने से चिंता बढ़ती है। फिलहाल जांच एजेंसी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन दस्तावेजों का वास्तविक इस्तेमाल किसने किया, कितने लोगों को फर्जी पहचान दी गई और भारत-नेपाल सीमा से जुड़े इस कथित नेटवर्क की पहुंच आखिर कितनी दूर तक है।