nepal Presidnet Bidhya Devi Bhandari
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नेपाल के सत्ताधारी गठबंधन के लिए अब यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा है कि वह राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को लेकर क्या रणनीति अपनाएं। भंडारी ने आम चुनाव से ठीक पहले नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले इस गठबंधन को गहरे असमंजस में फंसा दिया है। ये आम राय है कि नागरिकता कानून- 2006 में संशोधन के लिए पारित बिल पर दस्तखत करने से उनका इनकार करना असंवैधानिक है। उनके अपने रुख पर अडिग रहने के बाद सत्ता पक्ष के पास अकेला रास्ता महाभियोग लगाने का बचता है। लेकिन चुनाव से ठीक पहले सत्ताधारी गठबंधन इसका साहस दिखा पाएगा, इसको लेकर राजनीतिक हलकों में संदेह है।
बुधवार को भंडारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वे संशोधन विधेयक पर दस्तखत नहीं करेंगी। उसके बाद सत्ताधारी गठबंधन में शामिल पांच में से चार दलों ने एक बयान में राष्ट्रपति की कड़ी निंदा की। नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड सोशलिस्ट) और जनता समाजवादी पार्टी ने एक साझा बयान में कहा- राष्ट्रपति ने संवैधानिक प्रावधान का पालन और उसका संरक्षण करने के अपने दायित्व पर हमला किया है। संशोधन बिल के दोबारा पारित होने पर 15 दिन के अंदर उस पर दस्तखत करना राष्ट्रपति के लिए अनिवार्य था। ऐसा न करके उन्होंने संविधान का उल्लंघन किया है।
लेकिन सत्ताधारी गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय जनमोर्चा ने इस बयान पर दस्तखत नहीं किए। पार्टी के नेता हिमलाल पुरी ने मीडियाकर्मियों से कहा- ‘हमारी पार्टी इस बिल को राष्ट्रीय हित के खिलाफ मानती है। लेकिन वह राष्ट्रपति के इस पर दस्तखत ना करने के कदम का समर्थन नहीं करती।’ प्रमुख विपक्षी दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) ने भी इस बिल का संसद में विरोध किया था। विश्लेषकों के मुताबिक इसे देखते हुए साफ है कि सत्ताधारी गठबंधन के लिए राष्ट्रपति विरोधी कोई रणनीति तैयार करना आसान नहीं होगा।
विशेषज्ञों की राय है कि राष्ट्रपति ने अपने इस रुख से नेपाल के संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य को एक अभूतपूर्व संकट में फंसा दिया है। 2015 में नया संविधान लागू होने के बाद यह पहला मौका है, जब किसी राष्ट्रपति ने संसद की संप्रभुता का इतने खुलेआम ढंग से उल्लंघन किया हो। नेपाल के संविधान में राष्ट्रपति के अधिकार और कर्त्तव्यों का स्पष्ट उल्लेख है। इसके तहत वे किसी बिल को सिर्फ एक बार पुनर्विचार के लिए संसद को लौटा सकती हैं। अपने इस अधिकार का इस्तेमाल भंडारी पहले ही कर चुकी थीं।
इसके बावजूद राष्ट्रपति कार्यालय ने दावा किया है कि राष्ट्रपति का यह कदम संविधान सम्मत है। राष्ट्रपति के राजनीतिक सलाहकार लाल बाबू यादव ने एक बयान में कहा- ‘विधेयक कई संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है। राष्ट्रपति ने उन प्रावधानों की रक्षा का अपना दायित्व निभाया है।’
मगर संविधान विशेषज्ञ इस बात से सहमत नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बलराम के.सी. ने कहा है कि भंडारी यूएमएल की करीबी हैं और इसी पार्टी ने उन्हें राष्ट्रपति बनाया था। अब उन्होंने अपनी दलीय वफादारी के तहत फैसला किया है। विश्लेषकों ने कहा है कि अगर याचिका दी गई, तो सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति को बिल पर दस्तखत करने का आदेश दे सकता है। लेकिन यह सवाल उठाया गया है कि अगर राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया, तो उसके बाद क्या होगा?