Nepal Election: शेर बहादुर देउबा और केपी शर्मा ओली
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पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) अपनी चुनावी संभावनाओं को लेकर भयभीत है। जानकारों के मुताबिक पार्टी भले आम चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरने के दावे कर रही हो, लेकिन उसका अपना अंदरूनी आकलन इसके विपरीत है। आम चुनाव में यूएमएल का मुख्य मुकाबला सत्ताधारी गठबंधन से होगा। सत्ताधारी गठबंधन में प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड सोशलिस्ट) और राष्ट्रीय जनमोर्चा शामिल हैं।
नेपाल में संसदीय और प्रांतीय असेंबलियों के आम चुनाव के लिए अगले 20 नवंबर को वोट डाले जाएंगे। इसमें अपनी संभावनाएं मजबूत करने की कोशिश में यूएमएल ने जनता समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी-नेपाल के साथ सीटों का तालमेल किया है। पार्टी की उपाध्यक्ष अस्ता (Asta) लक्ष्मी शाक्य ने रविवार को कहा कि यूएमल को पूरा भरोसा है कि वह अपने विरोधियों को पछाड़ देगी। उन्होंने कहा- यूएमएल को कितनी सीटें जीतने की उम्मीद है, यह तो हम नहीं जाहिर करेंगे, लेकिन हमारी पार्टी सबसे बड़ा दल होकर उभरेगी।
लेकिन अखबार काठमांडू पोस्ट के मुताबिक पार्टी के अंदर आम चर्चा यह है कि चुनाव में उसे जोरदार झटका लगेगा। एक यूएमएल नेता ने इस अखबार से कहा- ‘संभव है कि संसद की प्रत्यक्ष निर्वाचन वाली सीटों में पार्टी को सिर्फ 30 से 35 सीटें मिलें। आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली सीटों के लिए भी उसे इसी अनुपात में वोट मिलने की संभावना है।’ समझा जाता है कि इसी आकलन के कारण यूएमएल ने जनता समाजवादी पार्टी के साथ सीटों का तालमेल करने का निर्णय लिया।
यूएमएल नेता निजी बातचीत में पार्टी की खराब संभावना के लिए पार्टी नेतृत्व को जिम्मेदार ठहरा रहे हैँ। उनकी राय है कि यूएमएल ने सही उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारे हैं। इससे पार्टी में माहौल बिगड़ा है। पार्टी की स्थायी समिति के सदस्य घनश्याम भुसाल ने इससे नाराज होकर पार्टी से इस्तीफा दे दिया।
एक यूएमएल नेता ने काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘पार्टी को सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवारों को चयन करना चाहिए था। लेकिन पार्टी ने गलती की और इसका असर चुनाव नतीजों पर पड़ेगा।’ पार्टी उपाध्यक्ष शाक्य ने भी यह स्वीकार किया कि पार्टी ने उम्मीदवारों में गलती की है। उन्होंने कहा- पार्टी के पास सही उम्मीदवार चुनने का अवसर था, लेकिन यह नहीं हो सका।
बीते अगस्त में यूएमएल की प्रांतीय समितियों के प्रभारियों की एक बैठक हुई थी। इसमें इन प्रभारियों ने चेतावनी दी थी कि अगर सत्ताधारी गठबंधन एकजुट रहा, तो यूएमएल को करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। सत्ताधारी गठबंधन एक अपवाद को छोड़ कर एकजुट होकर मैदान में उतरा है। लेकिन अब यूएमएल नेतृत्व का कहना है कि जनता समाजवादी पार्टी के सत्ताधारी गठबंधन से अलग होकर उससे तालमेल करने से सूरत बदल गई है। यूएमएल नेताओं को उम्मीद है कि इससे पार्टी के लिए संभावित नुकसान को सीमित रखा जा सकेगा।
जनता समाजवादी पार्टी का मधेस प्रांत में अच्छा प्रभाव है। उसके साथ आने से वहां यूएमएल को राहत मिली है। लेकिन बाकी प्रांतों में उसकी चुनौतियां पहले जितनी ही गंभीर बनी हुई हैँ।