Nepal: Sher Bahadur Deuba with Bidya Devi Bhandari
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नेपाल में आम चुनाव के लिए मतदान से ठीक पहले नागरिकता का मुद्दा फिर बहुचर्चित हो गया है। अभी ये मसला सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही से चर्चा में आया है। नेपाल की शेर बहादुर देउबा सरकार ने कुछ समय पहले नया नागरिकता कानून पारित किया था। लेकिन राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने उस पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया। संसद के दोबारा इस विधेयक को पास करने के बावजूद उन्होंने इसे मंजूरी नहीं दी। इससे ये मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया था और कोर्ट ने राष्ट्रपति को नोटिस जारी किया था।
नोटिस का जवाब देते हुए राष्ट्रपति ने दावा किया है कि उन्होंने यह कदम संविधान की रक्षा का अपना फर्ज निभाने के लिए उठाया। उनके कार्यालय ने कोर्ट में पेश अपने जवाब में कहा है कि अगर कोई विधेयक उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना पारित किया जाता है, तो राष्ट्रपति को उसे मंजूरी न देने का अधिकार है। जबकि कोर्ट में दायर याचिकाओं में दावा किया गया है कि संसद में किसी बिल के दो बार पारित होने के बाद राष्ट्रपति उस पर दस्तखत करने के लिए बाध्य हैं।
संसद में नेपाली काग्रेस के नेतृत्व सत्ताधारी गठबंधन में शामिल पांचों दलों ने समर्थन किया था। लेकिन प्रमुख विपक्षी दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) ने इसका विरोध किया था। यूएमएल चुनाव प्रचार के दौरान भी इसके खिलाफ राय जता रही है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक मधेश प्रांत में तो इस बिल के पक्ष में जनमत का भारी समर्थन है, लेकिन दूसरे प्रांतों में यूएमएल को लाभ हो सकता है। मतदान से चार दिन पहले इस मामले के चर्चा में आ जाने से चुनाव पर इस मुद्दे के संभावित असर को लेकर यहां अनुमान लगाए जा रहे हैं। नेपाल में आम चुनाव के लिए मतदान अगले रविवार यानी 20 नवंबर को होगा।
प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन करने का बिल उन बच्चों को नागरिकता प्रदान करने के मकसद पारित कराया था, जिनके माता-पिता में कोई एक विदेशी नागरिक रहा हो। इस बिल में प्रावधान है कि 12 अप्रैल 1990 के बाद नेपाल की धरती पर जन्मे हर व्यक्ति को देश की नागरिकता मिलेगी। मधेश प्रांत में ऐसे बड़ी संख्या में लोग हैं, जिनकी माताएं भारतीय मूल की हैं। स्पष्ट कानून के अभाव में इन लोगों की संतानों को नागरिकता नहीं मिली है।
अभी के कानून के मुताबिक विदेशी महिलाओं को तभी नेपाल की नागरिकता मिल सकती है, जब विवाह के बाद वे अपने मूल देश की नागरिकता छोड़ने की प्रक्रिया शुरू कर दें। उसके बाद ही उनके बच्चों को नागरिकता मिलेगी। यूएमएल इस प्रावधान को बनाए रखने के पक्ष में हैं। जबकि मधेश आबादी की नुमाइंदगी करने वाली पार्टियां चाहती हैं कि नेपाल में जन्मे सभी बच्चों को नागरिकता मिले, भले की माताएं किसी देश की नागरिक रही हों।
इस बिल का विरोध नारीवादी संगठनों ने भी किया था। उन्होंने कहा था कि इस बिल में विदेशी पुरुष को नेपाली महिला से शादी करने के आधार पर नेपाल की नागरिकता देने का प्रावधान नहीं है। इस तरह यह भेदभाव करने वाला कानून है। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने कहा है कि उन्होंने असंवैधानिक कानून को मंजूरी नहीं दी। लेकिन उन्होंने उम्मीद जताई है कि संसद ऐसी पहल करेगी, जिससे उनकी तरफ से जताई गई चिंताओं को दूर करते हुए नया नागरिकता कानून बने।