नेपाल और भारत के नेतृत्व के बीच मतभेद के बावजूद सीमा विवाद का स्थायी समाधान तलाशने के लिए दोनों देशों के पास बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं है। नेपाल के रक्षा विशेषज्ञों और पत्रकारों ने हालिया तनाव पर राय देते हुए कहा कि ओली सरकार ने राष्ट्रवाद के नाम पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए विवादित नक्शा पेश किया है। घरेलू राजनीति, चीन से मिल रहे मजबूत आर्थिक समर्थन और भारत की शालीनता ने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को दशकों पुराने सीमा विवाद को आगे बढ़ाने की हिमाकत करने की हिम्मत दी। उनके इस कदम से नेपाल और भारत के रिश्तों में इतनी तल्खी आई है। सामरिक मामलों के विशेषज्ञों ने रविवार को यह बात कही।
नेपाल के इस कदम के पीछे चीन का हाथ होने पर सूद ने कहा कि वह नहीं मानते कि काठमांडो ने यह मुद्दा चीन की ओर से उठाया है लेकिन हाल के सालों में नेपाल में चीन का प्रभुत्व बढ़ा है। 2015 में नेपाल के खिलाफ भारत के आर्थिक नाकाबंदी के बाद से चीन ने नेपाल में बड़े पैमाने पर वित्तीय संसाधन झोंके हैं। पेट्रोलियम और अन्य उत्पादों के परिवहन के लिए चीन नई सड़कें बना रहा है। काठमांडो और तिब्बत में शिगात्से को जोड़ने के लिए रेलवे नेटवर्क खड़ा करने की योजना है। साथ ही उसने नेपाल के लिए सामनों की शिपमेंट को चार बंदरगाहों की पेशकश की है। पहले यह शिपमेंट भारत के जरिए होता था।
जाने माने सामरिक मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर एसडी मुनि का कहना है कि नेपाल के कदम का बहुत बड़ा संदेश है कि वह पुराने ढर्रे पर वह नहीं चलेगा। वह अब दशकों पुराने संबंधों को भाव नहीं देते हैं। उनसे अब अलग ढंग से निपटना होगा, थोड़ा और संवेदनशीलता और थोड़ी और समझ के साथ। यह नया नेपाल है। 65 फीसदी से अधिक नेपाली युवा हैं। वे पहले की बातों की परवाह नहीं करते हैं। उनकी अपनी महत्वाकांक्षा हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि कई मामलों में भारत ने शालीनता का परिचय दिया और अपने इस छोटे पड़ोसी देश के साथ डील करने में अति आत्मविश्वास दिखाया। नेपाल इसका अपवाद नहीं है।
नेपाल में 2013 और 2017 की शुरुआत में नेपाल में राजदूत रहे रंजीत रे का कहना है कि पीएम ओली ने घरेलू राजनीति में खुद की स्थिति सुदृढ़ करने के लिए नए नक्शे पर आगे बढ़ने का फैसला लिया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पर बातचीत होने के बाद भी ओली इस पर आगे बढ़ते। भारत विरोधी भावनाओं ने उन्हें पहले भी चुनाव में जीत दिलाई है और घरेलू दबावों के चलते फिर से उसी रणनीति पर अमल कर रहे हैं। नेपाल में ओली की स्थिति काफी कमजोर है। आर्थिक मोर्चे, कोरोना से निपटने में उनकी सरकार की नाकामी के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हो रहे हैं। यहां तक नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर नेतृत्व बदलाव तक की अफवाहें हैं। ऐसे में यह फैसला ओली के लिए जीवनदान बन सकता है। नेपाल के इस फैसले ने सीमा विवाद के समाधान को और अधिक जटिल बना दिया है।