कोरोना वायरस संक्रमण से बचाव के लिए बने वैक्सीन को पेटेंट मुक्त करने की वार्ता नाकाम होने के कगार पर है। अगर इन वैक्सीन को पेटेंट मुक्त कर दिया जाए, तो उनका विकासशील देशों में सस्ती दर पर उत्पादन करने का रास्ता खुल जाएगा। हालांकि फिलहाल दुनिया में कोरोना महामारी काबू में है, लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दे रखी है कि अभी आश्वस्त होने का समय नहीं आया है।
कई राजनयियों और अधिकारियों ने वेबसाइट पोलिटिको.ईयू से बातचीत में कहा कि पेटेंट मुक्त करने की वार्ता में कई हलकों से अड़ेंगे डाले गए हैं। अब संभव है कि ये वार्ता टूट जाए। वार्ता से जुड़े एक राजनयिक ने कहा- ‘दुर्भाग्य की बात है कि ये वार्ता बहुत जटिल बनी हुई है।’ इस बारे में करार के लिए पेश दस्तावेज को ट्रिप्स वेवर (व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकार मुक्ति) नाम से जाना गया है।
विश्लेषकों ने कहा है कि इस वार्ता को आयोजित करने का डब्ल्यूटीओ का फैसला साहसी, लेकिन शुरुआत से ही जोखिम भरा था। बातचीत मुख्य रूप से चार पक्षों- यूरोपियन यूनियन (ईयू), अमेरिका, भारत, और दक्षिण अफ्रीका के बीच हो रही है। वार्ता लंबे समय तक बंद दरवाजों के अंदर हुई। लेकिन अब हाल यह है कि वार्ता में शामिल पक्ष ही इससे दूरी बना रहे हैं। एक राजनयिक ने वेबसाइट पोलिटिको से कहा- ‘दक्षिण अफ्रीका, भारत, अमेरिका या ईयू में कोई भी इस प्रक्रिया का स्वामित्व स्वीकार करने को तैयार नहीं है। इससे चीजें और पेचीदा हो गई हैं।’
लेकिन पेटेंट मुक्ति के लिए अभियान चलाने वाले गैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि अधिक उत्पादन से समस्या हल नहीं हुई है। बल्कि अब दवा उद्योग कह रहा है कि वह वैक्सीन उत्पादन में निवेश घटा देगा। इससे फिर वैक्सीन की कमी हो जाएगी।
कुछ मीडिया रिपोर्टों में बातचीत में ठहराव के लिए अमेरिका और चीन को दोषी बताया गया है। अमेरिका अड़ा हुआ है कि चीन भी पेटेंट मुक्ति का लिखित समझौता करे। जबकि चीन इसके लिए तैयार नहीं है। उसने जुबानी तौर पर यह जरूर कहा है कि इन वैक्सीन पर वह पेटेंट लागू नहीं करेगा। लेकिन एक राजनयिक ने कहा- ‘चीन के इस वादे से हम आश्वस्त नहीं हैँ। हम लिखित वादा चाहते हैँ।’