दक्षिण अफ्रीका की जानी-मानी न्यायविद् नवनीनम 'नवी' पिल्लई को वर्ष 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है। यह घोषणा नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में की गई। उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए यह सम्मान दिया गया है।
नवी पिल्लई ने अपने लंबे करियर में अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे और प्रभाव को व्यापक बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। रवांडा के अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में जज रहते हुए उनके प्रभाव से ही यह अभूतपूर्व कानूनी सिद्धांत स्थापित हुआ कि दुष्कर्म और यौन हिंसा को मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार का हिस्सा माना जा सकता है। इसी मामले में उनकी दूरदर्शिता से एक और कानूनी सफलता मिली, जब पहली बार केवल नफरती प्रोपेगैंडा फैलाकर नरसंहार भड़काने के आधार पर किसी आरोपी पर मुकदमा चलाया गया। उन्होंने अपनी निष्पक्षता, विशेषज्ञता और दृढ़ता से यह साबित किया कि कानूनी तंत्र युद्ध और हिंसा के कृत्यों को रोकने में कारगर हो सकते हैं। वे हमारे समय की सबसे सम्मानित अंतरराष्ट्रीय कानूनविदों में से एक हैं।
पुरस्कार मिलने के बाद क्या बोलीं नवी?
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नवी पिल्लई ने एलान के बाद कहा कि नेताओं का कानूनी दायित्व है कि वे मानवाधिकारों की रक्षा करें और युद्ध से बचें। 85 वर्षीय पिल्लई को जब पुरस्कार मिलने की खबर मिली, तब वह जर्मनी के नूर्नबर्ग में एक मंच पर मौजूद थीं। नूर्नबर्ग वही जगह है, जहां नाजी युद्ध अपराधियों पर मुकदमे चले थे और इससे अंतरराष्ट्रीय कानून की नींव मजबूत करने में मदद मिली थी। पुरस्कार की घोषणा के बाद लोगों ने खड़े होकर तालियां बजाईं। इस पर पिल्लै ने कहा कि इस जगह पर लोगों की सराहना उनके लिए बहुत मायने रखती है। उन्होंने कहा कि कोई भी पुरस्कार तभी खास होता है, जब जनता भी मानती हो कि आप उसके हकदार हैं।
- क्यों मिला पुरस्कार?: अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति को बढ़ावा देने के उनके असाधारण प्रयासों के लिए उन्हें वर्ष 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया है।
- प्रारंभिक जीवन और भारतीय मूल: उनका जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक गरीब परिवार में हुआ था। वह भारतीय तमिल मूल की हैं, जिनके दादा-दादी 1890 के दशक में भारत से दक्षिण अफ्रीका गए थे।
- प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पद: वह 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त रह चुकी हैं। इसके अलावा, उन्होंने रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (आईसीटीआर) की अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) की न्यायाधीश के रूप में भी सेवा दी है।
रवांडा नरसंहार मामले में अहम भूमिका
नवी पिल्लई ने रवांडा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में न्यायाधीश और अध्यक्ष के रूप में काम किया। इस न्यायाधिकरण ने 1994 के रवांडा नरसंहार से जुड़े मामलों की सुनवाई की। पिल्लई की भूमिका ऐसे ऐतिहासिक कानूनी फैसलों में महत्वपूर्ण रही, जिनमें यह स्थापित किया गया कि यौन हिंसा और दुष्कर्म परिस्थितियों के आधार पर मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार के अपराध का हिस्सा हो सकते हैं। उन्होंने नरसंहार के लिए उकसाने के मामले में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक ऐतिहासिक मामले में प्रचार के माध्यम से नरसंहार के लिए उकसाने के आरोपों पर सुनवाई हुई। इन कानूनी प्रयासों ने अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे को व्यापक बनाने में योगदान दिया।
अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने पर जोर
नोबेल समिति ने अपने बयान में कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून का उद्देश्य केवल देशों के बीच नियम तय करना नहीं, बल्कि संघर्षों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने और दोषियों को जवाबदेह बनाने की व्यवस्था तैयार करना भी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के गठन से इस व्यवस्था का विस्तार हुआ। शीत युद्ध समाप्त होने के बाद अंतरराष्ट्रीय न्यायिक तंत्र को मजबूत करने के प्रयासों को भी गति मिली। हालांकि, समिति ने यह भी स्वीकार किया कि अंतरराष्ट्रीय कानून की व्यवस्था हमेशा समान रूप से प्रभावी नहीं रही है। शक्तिशाली देशों और उनके नेताओं ने कई बार जवाबदेही से बचने की कोशिश की है। अलग-अलग मामलों में न्यायिक कार्रवाई के परिणाम भी अलग रहे हैं। इसके बावजूद, कूटनीति, संधियों और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से विवादों को सुलझाने की दिशा में प्रगति हुई है। समिति के मुताबिक, स्थायी शांति के लिए कानून का शासन जरूरी है। वह दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में नियुक्त होने वाली पहली गैर-श्वेत महिला न्यायाधीश थीं। वह प्रतिष्ठित हार्वर्ड लॉ स्कूल से कानून में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाली पहली दक्षिण अफ्रीकी नागरिक भी हैं।
- ऐतिहासिक फैसले: रवांडा न्यायाधिकरण के दौरान उन्होंने 'अकायेसु मामले' में एक युगांतकारी भूमिका निभाई, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून के इतिहास में पहली बार बलात्कार और यौन हिंसा को 'नरसंहार' और युद्ध अपराध के रूप में मान्यता दी गई।
- हालिया कार्य: वर्तमान में वे फलस्तीनी क्षेत्रों में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए गठित संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जांच आयोग की अध्यक्षता कर रही हैं।
युद्ध और संघर्षों के बीच कानून की जरूरत
नोबेल समिति ने कहा कि मौजूदा दौर में दुनिया लंबे समय से अधिक युद्धों और संघर्षों जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय कानून शांति और सुरक्षा का केवल सहायक साधन नहीं, बल्कि अनिवार्य आधार है। समिति ने चिंता जताई कि अंतरराष्ट्रीय कानून की व्यवस्था और उससे जुड़ी संस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा है। कई मामलों में कानून और न्याय की जगह शक्ति की राजनीति को प्राथमिकता दी जा रही है। उसके अनुसार, जब ताकत को कानून से ऊपर रखा जाता है, तो इससे देशों के बीच स्थिरता, विश्वास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व कमजोर होता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानून का शासन ही विवादों को हिंसा के बजाय शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाने की बुनियाद है।
नोबेल शांति पुरस्कार की स्थापना के 125 साल
इस साल नोबेल शांति पुरस्कार की स्थापना के 125 वर्ष पूरे हो रहे हैं। पहला नोबेल शांति पुरस्कार 1901 में दिया गया था। पुरस्कार की मूल भावना में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान प्रमुख रहे हैं। नोबेल समिति ने कहा कि नवी पिल्लई का करियर दुनिया को याद दिलाता है कि न्याय, मानवाधिकार और कानून के शासन को मजबूत करना स्थायी शांति के लिए जरूरी है। उन्होंने राज्यों और राष्ट्रीय नेताओं को जवाबदेह बनाने के साथ-साथ हिंसा और संघर्ष के पीड़ितों के लिए न्याय की उम्मीद भी मजबूत की है। समिति के अनुसार, पिल्लई का काम अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को मजबूत करने और मानव गरिमा की रक्षा के लिए प्रयासरत लोगों के लिए प्रेरणा है।