पाकिस्तान में पहली बार बनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के पीछे मुख्य दिमाग देश की सुरक्षा एजेंसियों का है। इस बात का संकेत इस नीति पर पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई की प्रतिक्रिया से मिलता है। इस नीति को तैयार करने की प्रक्रिया कुछ समय से चल रही थी। हालांकि इमरान खान सरकार ने इस प्रक्रिया में विपक्षी दलों को भी शामिल करने की कोशिश की, लेकिन इस सिलसिले में उन दलों की भूमिका सीमित ही रही है।
सेना के प्रवक्ता ने ये बयान एनएसपी 2022-2026 को संघीय सरकार की मंजूरी मिलने के बाद कुछ घंटों के ही बाद आया। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) सरकार ने इस नीति को अपनी एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया है। सरकार की तरफ से कहा गया है कि नई नीति का मकसद देश की आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करना और साथ ही बाहरी एवं आतंरिक चुनौतियों का मुकाबला करना है।
पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता इफ्तिखार ने कहा है कि इस नीति में जो उद्देश्य तय किए गए हैं, उन्हें हासिल करने के लिए पाकिस्तान की सेना अपेक्षित भूमिका निभाएगी। बताया जाता है कि इस दस्तावेज का बुनियादी मसविदा पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद युसूफ ने तैयार किया। नीति दस्तावेज को सरकार की मंजूरी मिलने के बाद उन्होंने कहा कि इस नीति से अलग-अलग क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी। मोईद ने कहा- ‘प्रधानमंत्री के निरंतर नेतृत्व और प्रोत्साहन के बिना ये नीति हकीकत का रूप नहीं लेती।’
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है इस नीति दस्तावेज पर चर्चा के लिए सरकार की तरफ से बुलाई गई एक अहम बैठक का विपक्षी नेताओं ने बहिष्कार कर दिया था। विपक्षी नेताओं ने कहा था कि वे सीधे प्रधानमंत्री से नीति दस्तावेज पर बातचीत करना चाहते थे, जबकि सरकार ने इस बारे में जानकारी देने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को दे दी। इसके बावजूद विपक्षी नेताओं ने पारित दस्तावेज पर कोई आलोचनात्मक टिप्पणी नहीं की है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इसकी वजह सेना का प्रभाव है। पाकिस्तान में राजनीतिक सुरक्षा संबंधी मसलों पर राजनीतिक दल अकसर चुप रहना ही पसंद करते हैं।