मार्स ग्रह पर कीटों के होने का दावा
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मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। नासा के रोवरों द्वारा भेजी गई कुछ तस्वीरों में कथित रूप से पंखों वाले कीड़े, छिपकली जैसे जीव और शिकारी जैसे जीवन रूप दिखाई देने के दावों ने वैज्ञानिको का ध्यान खींचा है। हालांकि यह विचार बेहद रोमांचक है कि मंगल की सतह पर कीड़े उड़ रहे हों या धूल के बीच कोई जीव छिपा हो, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय का बड़ा हिस्सा इन दावों को लेकर काफी सतर्क और संशयपूर्ण है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मंगल सौरमंडल के सबसे अधिक अध्ययन किए गए ग्रहों में से एक है और अब तक वहां किसी जटिल जीव के अस्तित्व का ठोस प्रमाण नहीं मिला है। हाल के दावे मुख्य रूप से नासा के मार्स रोवर, विशेषकर क्यूरियोसिटी रोवर द्वारा ली गई तस्वीरों की व्याख्या से जुड़े हैं।
कीट विज्ञानी विलियम रोमोसर ने सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रोवर छवियों का अध्ययन करते हुए दावा किया कि इनमें कीड़ों जैसे और सरीसृपों जैसे आकार दिखाई देते हैं। उन्होंने अपनी प्रस्तुति एविडेंस ऑफ एक्सटेंट इंसेक्ट-लाइक ऑर्गेनिज्म्स ऑन मार्स और उसके सप्लीमेंटल मैटेरियल में तर्क दिया कि कुछ आकृतियां पंख, पंखों की मोड़ संरचना और व्यवस्थित पैरों जैसी बनावट दिखाती हैं। रोमोसर का कहना था कि मंगल पर जीवन था और अब भी है।
उन्होंने एंटोमोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका की एक बैठक में भी अपने अवलोकन प्रस्तुत किए। उनका दावा था कि कुछ सी आकृतियां ऐसी लगती हैं मानो वे गति में हों या अपने आसपास के वातावरण के साथ किसी प्रकार की क्रिया कर रही हों। जैसे-जैसे मंगल की हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो रही हैं, इन दावों ने फिर से ध्यान खींचा है और स्वतंत्र शोधकर्ता भी इन छवियों का विश्लेषण कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों का दावों को मानने से इन्कार
हालांकि इन दावों में रोमांच जरूर है, लेकिन ज्यादातर वैज्ञानिक इन्हें स्वीकार नहीं करते। इसका सबसे बड़ा कारण एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है, जिसे पैरिडोलिया कहा जाता है। पैरिडोलिया का अर्थ है, मनुष्य का रैंडम आकृतियों में परिचित चेहरों, जानवरों या वस्तुओं को देख लेना। उदाहरण के लिए बादलों में चेहरा दिखना या चट्टानों में किसी जीव की आकृति नजर आना। ग्रह विज्ञान में यह एक बड़ी चुनौती मानी जाती है, क्योंकि दूसरे ग्रहों की सतही तस्वीरों का अध्ययन करते समय वैज्ञानिकों को इसी भ्रम से बचना पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार मंगल पर दिखाई देने वाली ये आकृतियां वास्तव में लाखों वर्षों से चल रही हवा, धूल और अपरदन प्रक्रियाओं से बनी चट्टानें हो सकती हैं।