म्यांमार में नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (एनयूजी) नाम से वैकल्पिक सरकार के गठन के बाद एक साल गुजर चुका है। साल भर पहले एनयूजी ने सैनिक शासन के खिलाफ संघर्ष का एलान किया था। म्यांमार की सेना एक फरवरी 2021 को निर्वाचित प्रतिनिधियों को बेदखल कर सत्ता अपने हाथ में ले ली थी। तब से देश में गृह युद्ध जैसी स्थिति है। कई बागी गुट देश के अलग-अलग इलाकों में हथियारबंद युद्ध लड़ रहे हैं। एनयूजी का गठन पूर्व सत्ताधारी दल नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी से जुड़े नेताओं ने किया था।
एनयूजी के कार्यवाहक अध्यक्ष दुवा लाशी ला ने इस महीने एक महत्त्वपूर्ण भाषण दिया। उसमें उन्होंने दावा किया कि सेना विरोधी सशस्त्र विद्रोहियों का अब म्यांमार के आधे से ज्यादा इलाके पर कब्जा हो चुका है। उन्होंने कहा- ‘इलाकों पर वर्चस्व बढ़ने के साथ ही हमारी सैनिक क्षमता मजबूत हुई है। हमारी गतिविधियां और हमारे सहयोगी सशस्त्र विद्रोही गुटों का सार्वजनिक प्रशासन मजबूत हुआ है।’ दुवा का इशारा म्यांमार के उन नस्ल आधारित विभिन्न विद्रोही गुटों की तरफ था, जिन्हें ‘एथनिक रिवॉल्यूशनरी ऑर्गनाइजेशंस’ (ईआरओ) के नाम से जाना जा रहा है।
इस बीच संयुक्त राष्ट्र के पूर्व विशेषज्ञों को लेकर बनाई गई स्पेशल एडवाइजरी काउंसिल फॉर म्यांमार की हाल में जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि अब म्यांमार के 20 फीसदी से भी कम इलाके पर सैनिक शासन का कब्जा रह गया है। 53 फीसदी क्षेत्र पर एनयूजी और उसके सहयोगी संगठनों का नियंत्रण है। बाकी इलाकों पर किसका कब्जा है, इसे साफ-साफ नहीं कहा जा सकता।
संभवतया इसी हकीकत को स्वीकार करते हुए कुछ देशों की सरकारों ने एनयूजी से संपर्क बनाना शुरू कर दिया है। मलेशिया ने मांग की है कि दक्षिण पूर्व देशों का संघ (आसियान) अब एनयूजी को म्यांमार की वैध सरकार के रूप में मान्यता दे। कुछ पश्चिमी देशों में भी एनयूजी को या तो म्यांमार की वैध सरकार के रूप में मान्यता देने या फिर उसे वित्तीय सहायता देने की मांग उठी है।
ब्रिटेन की मशहूर पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने हाल में एक लेख इस शीर्षक के साथ छापा- म्यांमार की वैकल्पिक सरकार अधिक मदद पाने योग्य है। इस लेख में कहा गया कि अगर अमेरिका एनयूजी को मान्यता दे दे, तो वह एक बिलियन डॉलर की म्यांमार की संपत्ति पाने का हकदार हो जाएगा, जिसे अमेरिका ने जब्त कर रखा है।
लेकिन वेबसाइट एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि एनयूजी के पक्ष में बनते हालात के बावजूद पश्चिमी देशों ने अभी तक उससे संपर्क साधने की कोशिश नहीं की है। वाशिंगटन स्थित नेशनल वॉर कॉलेज में प्रोफेसर जेचेरी अबुजा ने एशिया टाइम्स को बताया कि अमेरिका की नीति एनयूजी को मान्यता ना देने और उससे कोई सीधा संबंध ना रखने की है। इसका प्रमुख कारण यह है कि म्यांमार के कई विद्रोही गुट मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल हैं।
एनयूजी में नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के अलावा सैनिक शासन विरोधी कुछ समूह भी शामिल हैं। एनयूजी ने सैनिक शासन को हटाने के बाद देश में संघीय व्यवस्था लागू करने का वादा किया है। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 26 सदस्यीय इस मंत्रिमंडल में 13 सदस्य नस्लीय अल्पसंख्यक समूहों से लिए गए हैं।