म्यांमार में सैनिक शासन विरोधियों के बर्बर दमन के बावजूद लोकतंत्र बहाली आंदोलन धीमा नहीं पड़ रहा है। सोमवार से देश की बड़ी ट्रेड यूनियनों ने हड़ताल की शुरुआत कर दी। उन्होंने मजदूरों अर्थव्यवस्था ठप कर देने का आह्वान किया है। इस बीच बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बाद अब सैनिक शासकों ने विदेशों में अपनी छवि सुधारने के लिए एक पब्लिक रिलेशंस (पीआर) एजेंसी की मदद लेने का फैसला किया है। पश्चिमी देशों ने तखता पलट कर सत्ता हथियाने वाले सैनिक शासकों को म्यांमार का अवैध शासक बताया है। साथ ही उस पर मानवता के खिलाफ अपराध करने के आरोप लगाए हैँ।
अब सैनिक शासकों ने एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय लॉबिस्ट की नियुक्ति की है, जो अतीत में भी तानाशाहों और विवादास्पद शासकों को पीआर सेवा दे चुका है। इस लॉबिस्ट का नाम एरी बेन-मेनाशे है। उसका जन्म तेहरान में हुआ था, लेकिन वह कनाडा में रहता है। म्यामांर के सैनिक शासन ने कहा है कि उसकी नियुक्ति दुनिया को ‘असली स्थिति बताने’ के लिए की गई है। बेन-मेनाशे की नियुक्ति के बारे में सबसे पहले जानकारी वॉशिंगटन स्थित संस्था फॉरेन लॉबी ने दी। ये संस्था विदेशों में जनमत को प्रभावित करने के लिए विभिन्न देशों की सरकारों की तरफ से किए जाने उपायों पर नजर रखती है।
बेन-मेनाशे पहले हथियारों का सौदागर रह चुका है। वह जिंबाब्वे के पूर्व राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे, सूडान के सैनिक शासकों, वेनेजुएला, ट्यूनिशिया और किर्गिस्तान के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों आदि को अपनी सेवाएं दे चुका है। ब्रिटिश अखबार द गार्जियन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक बेन-मेनाशे ने अपनी ताजा नियुक्ति की पुष्टि की है। उसने इस बात की भी पुष्टि की है म्यांमार सरकार से उसे ‘एक बड़ी रकम’ मिली है। साथ ही अगर वह म्यांमार के सैनिक शासकों की छवि सुधारने में कामयाब रहा, तो उसे बोनस भी मिलेगा।
बेन-मेनाशे ने कहा कि उसकी पॉलिटकल कंसल्टिंग फर्म- डिकेन्स एंड मैडसन कनाडा- अमेरिका और अन्य सरकारों से संपर्क करेगी। बेन-मेनाशे के मुताबिक इन देशों में म्यांमार के सैनिक शासकों को गलत ढंग से समझा गया है। जानकारों के मुताबिक बेन-मेनाशे की कंपनी पश्चिमी देशों में यह कहानी फैलाएगी कि नेशनल लीड फॉर डेमोक्रेसी की नेता आंग सान सू ची ने रोहिंग्या मुसलमानों के कत्ल-ए-आम में उससे कही ज्यादा बड़ी भूमिका निभाई, जितना पश्चिमी देशों में समझा जाता है। साथ ही ये बात भी वहां बताई जाएगी कि सू ची देश को चीन की गिरफ्त में सौंप रही थीं। इसे रोकने के लिए सेना ने अपने हाथ में सत्ता ली। गौरतलब है कि पिछले संसदीय चुनाव में एनएलडी को भारी बहुमत मिला। लेकिन पिछले एक फरवरी को सेना ने नई संसद की बैठक से कुछ घंटे पहले ही सत्ता हथिया ली।
बेन-मेनाशे की फर्म यह बात भी पश्चिमी देशों को बताने की तैयारी में है कि एनएलडी ने धांधली के जरिए चुनाव जीता। बेन-मेनाशे ने एक समाचार एजेंसी से कहा है कि उसने हाल में दो बार म्यांमार का दौरा किया है। उस दौरान उसे बड़े पैमाने पर प्रतिरोध के कोई लक्षण नहीं दिखे। उसने दावा किया है कि मौजूदा लोकतंत्र समर्थक आंदोलन को म्यांमार की बहुसंख्यक जनता का समर्थन हासिल नहीं है। उसने यह भी दावा किया कि प्रदर्शनों से निपटने की जिम्मेदारी पुलिस की है। इसमें सेना शामिल नहीं है।
लेकिन विश्व मीडिया में छपी तस्वीरों और वीडियो में सैनिक प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई करते देखे गए हैं। साथ ही चुनाव के समय आए अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने बड़े पैमाने पर धांधली की बात साफ शब्दों में खंडन किया था। सेना की फायरिंग में दर्जनों लोग मारे जा चुके हैं। इसके अलावा लोगों को घरों से उठाने और अन्य तरह के दमन की खबरें मीडिया में छायी हुई हैं। विश्लेषकों का कहना है कि इस हकीकत के मद्देनजर लॉबिस्ट फर्म अपने मकसद में कामयाब हो पाएगी, इसमें शक है।