म्यांमार की सरकार ने हाल में दो पनडुब्बियां खरीदी हैं। उनके इस फैसले को लेकर कूटनीतिक हलकों में हैरत जताई गई है। म्यांमार की सीमा हर तरफ से किसी ना किसी देश की जमीन से लगती है। यानी उसकी कोई समुद्री सीमा नहीं है। आम समझ यही है कि ऐसे देश नौसेना पर ज्यादा खर्च नहीं करते।
जानकारों के मुताबिक पनडुब्बियों की इन खरीदारी में गहरा कूटनीति संदेश छिपा है। भारत 2013 से म्यांमार को गोला बारूद और रात्रि-दृष्टि (नाइट विजन) उपकरणों की सप्लाई कर रहा था। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए भारत ने म्यांमार को पुनडुब्बी दी थी। इससे म्यांमार में भारत का प्रभाव बढ़ने की उम्मीद की गई थी। लेकिन साल भर पहले हुए सैनिक तख्ता पलट ने समीकरण बदल दिए हैँ। अब चीन ने हथियारों की सप्लाई बढ़ा दी है।
विश्लेषकों के मुताबिक म्यांमार की सेना अब चीन में बनी टैंक भेदी सी-802 मिसाइलों से लैस है। जबकि म्यांमार की वायु सेना को चीन ने जेएफ-17 थंडर फाइटर्स और शान्क्सी वाई-8 ट्रांसपोर्ट विमानों की सप्लाई की है। इसी क्रम में पनडुब्बी की सप्लाई भी उसने की है।
वेबसाइट एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक म्यांमार को हथियार सप्लाई करने की होड़ में अब रूस भी उतर गया है। बीते 23 जनवरी को रूस में बने टैंक और अन्य उपकरण म्यांमार की सेना को सौंपे गए। लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि म्यांमार की सेना फिलहाल जंगलों में छिपे छापामार दस्तों से युद्ध लड़ रही है। ऐसी लड़ाई में हाल में खरीदे गए टैंक और भारी बख्तरबंद वाहनों का कोई इस्तेमाल संभव नहीं है। ऐसे में यह संदेह जताया जा रहा है कि ये तमाम खरीदारियां सत्ताधारी सैन्य अधिकारियों की जेब भरने के लिए की गई हैं।