नेपाल के प्रधानमंत्री प्रफुल्ल कमल दहल प्रचंड ने कहा कि वह अगले हफ्ते अपने दौरे के दौरान भारत के साथ किसी तरह के विवादित समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे लेकिन उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान मधेसी आंदोलन पर कुछ कड़वा अनुभव के बाद द्विपक्षीय संबंधों में आपसी विश्वास बहाली के लिए एक मजबूत नींव रखनी होगी। माओवादी नेता 4 अगस्त को दूसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने हैं। उन्होंने चीन समर्थित केपी ओली से देश की सत्ता संभाली है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों और श्रम मामलों की संसदीय कमेटी को संबोधित करते हुए प्रचंड ने कहा कि वह 15 सितंबर से भारत के दौरे पर हैं और यह उनके लिए चुनौतीपूर्ण अवसर है। मैं आश्वस्त हूं कि भारत का दौरा न केवल रिश्तों को सामान्य बनाने बल्कि हाल ही में कुछ कड़वे अनुभव के बाद यह आपसी विश्वास बहाली के लिए एक मजबूत नींव का निर्माण भी करेगा।
नेपाल इंस्टीच्यूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन द्वारा आयोजित इंडो-नेपाल संबंधों पर व्याख्यान देते हुए 61 वर्षीय प्रचंड ने कहा कि एक नेता को विशेषाधिकार के तहत जोखिम उठाना चाहिए। मैं देश के सभी लोगों से आग्रह करता हूं कि वे मुझे हुक्म नहीं दें और मुझे हमारे राष्ट्रहित के पक्ष में जोखिम लेने दें।
मैं अपने दोनों पड़ोसियों भारत और चीन से संबंधों को प्रगाढ़ करना चाहता हूं। उन्होंने ओली सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि पिछली सरकार ने पहाड़ और जमीन पर रहने वाले लोगों के बीच एक खाई खींच दी है और यह किसी भी देश के लिए सही नहीं है। देश बगैर मजबूत राष्ट्रीय एकता के समृद्ध नहीं हो सकता।