कोरोना वायरस के म्यूटेशन को लेकर ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक बड़ा खुलासा किया है। यूके कोविड-19 जीनोमिक्स कंसोर्टियम (सीएजी- यूके) के सदस्यों ने कोरोना के भीतर 17 बदलावों का पता लगाया है। अधिकतर बदलाव कोरोना के स्पाइक प्रोटीन में हुए हैं। जिसकी मदद से वायरस मानव कोशिकाओं पर चिपक कर शरीर के भीतर अपनी संख्या बढ़ाता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम के इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबायोलॉजी एंड इनफेक्शन के प्रोफेसर और सीईओजी यूके के सदस्य प्रोफेसर निक लोमान का कहना है कि 17 तरह के जो बदलाव हुए हैं उसमें वायरस की की प्रोटीन संरचना में बदलाव संभव है और अभी जो वायरस फैल रहा उससे अलग हो सकता है।
वह बताते हुए हैं कि अभी तक की अधिकतर वैक्सीन वायरस के स्पाइक प्रोटीन के अनुसार तैयार हुई हैं जिसका काम भविष्य में वायरस के हमले से बचाना है। अगर अभी वायरस के स्पाइक प्रोटीन में म्यूटेशन हुआ है तो वह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को धोखा दे सकता है।
दक्षिणी इंग्लैंड में करीब एक हजार मामले आए सामने
वीयूआई- 202012/01 की वैज्ञानिकों ने की पहचान
वैज्ञानिकों का कहना है कि नए स्ट्रेन वीयूआई- 202012/01 को पहली बार पहचान सितंबर में केंट में हुई। संभावना है कि यह वायरस दोबारा लंदन और दक्षिण पूर्व में सक्रिय हुआ है। एक अनुमान के अनुसार, दक्षिणी इंग्लैंड में नए स्ट्रेन के करीब 1000 मामले सामने आए हैं लेकिन इन मामलों के सटीक स्थान का पता नहीं चला है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना का ये नया स्ट्रेन किस तरह से घातक हुआ इसका पता भी नहीं चल पाया है।
अधिक संक्रामक पर जानलेवा नहीं
सीओसजी-यूके का कहना है कि वायरस का यह स्ट्रेन पहले वाले स्ट्रेन की तुलना में तेजी से फैल रहा है। यह वायरस स्पेन से छुट्टी मनाने आए लोगों से फैला है। और अब अधिक संख्या में संक्रमण का बड़ा कारण है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ये स्ट्रेन और अधिक संक्रामक हो सकता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि वायरस बहुत अधिक जानलेवा नहीं है।
दूसरे देशों में स्ट्रेन का पता लगाना होगा
कार्डिफ यूनिवर्सिटी के जीनोमिक्स और वायरस एक्सपर्ट और सीओजी-यूके के सदस्य प्रोफेसर टॉम कोनॉर का कहना है कि यह स्पष्ट है कि वायरस का यह स्ट्रेन है और अब देश भर में फैल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि स्ट्रेन किसी और देश से आया है इसके कोई साक्ष्य नहीं हैं। विशेषज्ञों वैज्ञानिकों का कहना है कि नार्थ ब्लाक में जो अब तक मामले सामने आए हैं उसमें 20 फीसदी नए मामले इसी स्ट्रेन के हैं। दुनिया के दूसरे देशों में यह स्ट्रेन है इसका पता अध्ययन से ही चल सकता है।