उल्कापिंड की टक्कर से उस जगह मौजूद चट्टानें अत्यधिक गरम होकर उड़ जाती हैं। इसके बाद द्रव्यशील चट्टानें ठंडी होकर टेक्टाइट्स में बदलती हैं।
इन्हीं बिखरे टेक्टाइट्स से उल्कापिंड के टकराने की जगह का पता चलता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि सबसे अधिक टेक्टाइट्स इंडोचाइना प्रायद्वीप में मिले।
इस प्रायद्वीप में कंबोडिया, लाओस और वियतनाम हैं। इसके बाद इस क्षेत्र में तलाश को प्रोत्साहन मिला।
सेह के मुताबिक गड्ढे की खोज पहले कंबोडिया, मध्य लाओस और दक्षिणी चीन में प्राचीन जगहों पर की गई। इन स्थानों पर मिले अवशेष बहुत पुराने उल्कापिंडों के थे। आखिर में दक्षिणी लाओस के बोलवेन प्लाटू में वह लावा प्रवाह मिला जो 51000 से 780,000 साल के बीच था।
2300 वर्ग मील के पठारों पर हुए विस्फोटों से 1000 फुट गहरे वलयाकार गड्ढे कर बन गए थे। इसके चलते ज्वालामुखी क्षेत्र बना जिसने उस विशाल गड्ढे को छिपा लिया जहां उल्कापिंड टकराया था।
शोध रिपोर्ट के मुताबिक ज्वालामुखी क्षेत्र की चट्टानों में टेक्टाइट्स था। शोधकर्ताओं ने बोलवेन प्लाटू में जमीन के नीचे 300 फुट गहरा, 11 मील लंबा और 8 मील चौड़ा अंडाकार क्षेत्र तलाशा। यहां गुरुत्वाकर्षण अजीब था। वैज्ञानिकों ने इसे ही उल्कापिंड के टकराने की जगह माना है।