बांग्लादेश ने सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के मक्का रक्षा गठबंधन में शामिल होने का दरवाजा खुला रखा है, लेकिन सैन्य शर्तों और जिम्मेदारियों का पूरा खाका सामने आने तक वह अंतिम फैसला टाल सकता है। 7 अगस्त को हस्ताक्षरित इस समझौते के तहत किसी एक सदस्य पर हमला बाकी सदस्यों के खिलाफ भी हमला माना जाएगा। तीनों देशों ने रणनीतिक राजनीतिक एवं रक्षा समिति बनाई है, जिसकी पहली बैठक हाल ही में इस्तांबुल में हुई।
बांग्लादेशी रणनीतिक हलकों में अब सवाल उठ रहा है कि इस समझौते में शामिल होने पर सैन्य-तकनीकी सहयोग कितना मिलेगा और किसी सदस्य पर हमले की स्थिति में ढाका की सैन्य प्रतिबद्धता कितनी बढ़ जाएगी। मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) फजले इलाही अकबर ने प्रोथोम आलो में कहा कि प्रावधान के अंतिम रूप में आने के बाद ही ढाका अपनी सैन्य क्षमता के आधार पर पड़ताल कर सकता है। उन्होंने हर शर्त की विस्तृत जांच और संसद, राजनीतिक दलों तथा हितधारकों से सलाह की जरूरत बताई।
विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद ने कहा कि ढाका स्थिति का आकलन कर रहा है और किसी भी फैसले में राष्ट्रीय हित प्राथमिकता में होंगे। विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने पहले कोई जोखिम न दिखने की बात कही थी। इधर विदेश मंत्री खलीलुर रहमान संसद में कह चुके हैं कि अगर मौजूदा सदस्य बांग्लादेश को शामिल करना चाहें तो ढाका प्रस्ताव पर सकारात्मक विचार करेगा।
सैन्य दायित्व सबसे बड़ा सवाल
मक्का रक्षा गठबंधन के समर्थक इसे तुर्किये और सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने और सैन्य क्षमता मजबूत करने का अवसर मानते हैं। वहीं पूर्व राजनयिक एम. हुमायूं कबीर ने चेताया है कि सैन्य गठबंधन में शामिल होना बांग्लादेश की पांच दशक पुरानी संतुलित और गैर-गुटीय विदेश नीति में महत्वपूर्ण बदलाव होगा। सदस्यता सीधे द्विपक्षीय सैन्य गठबंधन नहीं होगी, लेकिन बहुपक्षीय व्यवस्था में दोनों देशों की सेनाओं और सुरक्षा प्रतिष्ठानों के बीच सहयोग बढ़ सकता है। इससे ढाका की विदेश नीति पर सवाल तेज हो सकते हैं। समर्थक इसे व्यापक मुस्लिम दुनिया की सामूहिक सुरक्षा और रणनीतिक क्षमता बढ़ाने का साधन बताते हैं।
भारत की चिंता और सिलिगुड़ी
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कई बार कहा है कि वह मक्का पैक्ट से जुड़े सभी घटनाक्रमों पर करीबी नजर रख रहा है। बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के पूर्व महानिदेशक केएएस मुर्शिद ने सुझाव दिया है कि अगर ढाका शामिल होना चाहे तो भारत को लिखित आश्वासन दे सकता है कि सिलिगुड़ी कॉरिडोर से निर्धारित दूरी के भीतर मक्का पैक्ट के साझेदारों से जुड़ा कोई सैन्य अड्डा, आवाजाही अधिकार, हवाई सैन्य इस्तेमाल या ढांचा नहीं होगा। यह दिखाता है कि भारत की सुरक्षा चिंता को सदस्यता छोड़ने के बजाय आश्वासन देकर संभालने की चर्चा हो रही है।
ढाका की दुविधा
एक ओर बांग्लादेश भारत के साथ संबंध खराब नहीं करना चाहता। भारत प्रमुख पड़ोसी है और व्यापार, संपर्क, ऊर्जा तथा क्षेत्रीय सुरक्षा में हित जुड़े हैं। लिहाजा फिलहाल सबसे सुरक्षित रास्ता यही दिखता है कि समझौते से जुड़े सैन्य दायित्वों पर पहले स्पष्टता हासिल की जाए। अगर अंतिम शर्तें पर्याप्त रणनीतिक गुंजाइश देती हैं और भारत की सिलिगुड़ी संबंधी चिंता लिखित व्यवस्था से दूर की जा सकती है, तो सदस्यता ली जा सकती है। अगर सदस्यता क्षेत्रीय संघर्ष में खींचने वाली साबित होती है, तो पारंपरिक संतुलन छोड़ना कठिन होगा। ढाका ने पैक्ट को खारिज नहीं किया है, लेकिन इसके पक्ष में फैसला भी नहीं लिया है। जाहिर है सैन्य शर्तें और जिम्मेदारियां ही इस फैसले की निर्णायक कसौटी होंगी।