बांग्लादेश भी मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने पर विचार कर रहा है, लेकिन पहले वह समझौते की रणनीतिक शर्तों का गहनता से अध्ययन करना चाहता है। बांग्लादेश की चिंता अपनी गैर गुटीय कूटनीति को लेकर भी है, जिसके दम पर उसने तेज विकास हासिल किया।
बांग्लादेश ने सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के मक्का रक्षा गठबंधन में शामिल होने का दरवाजा खुला रखा है। हालांकि सैन्य शर्तों और जिम्मेदारियों का पूरा खाका सामने आने तक वह अंतिम फैसला टालने के मूड में दिखाई दे रहा है। इसके तहत किसी एक सदस्य पर हमला बाकी सदस्यों के खिलाफ भी हमला माना जाएगा।
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शर्तों का क्यों है इंतजार?
बांग्लादेशी रणनीतिक हलकों में सवाल है कि किसी सदस्य पर हमले की स्थिति में ढाका की सैन्य प्रतिबद्धता किस सीमा तक होगी। रिटायर्ड मेजर जनरल फजले इलाही अकबर ने अखबार प्रोथोम आलो में कहा कि सदस्यता पर फैसला लेने से पहले समझौते की हर शर्त और धारा की गहन जांच होनी चाहिए। साथ ही संसद, राजनीतिक दलों और अन्य हितधारकों से व्यापक मशविरा होना चाहिए।
विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद ने कहा कि ढाका स्थिति का आकलन कर रहा है और किसी भी फैसले में राष्ट्रीय हित प्राथमिकता होगी। विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने पहले कोई जोखिम न दिखने की बात कही थी। विदेश मंत्री खलीलुर रहमान संसद में कह चुके हैं कि अगर मौजूदा सदस्य बांग्लादेश को शामिल करना चाहें तो ढाका प्रस्ताव पर सकारात्मक विचार करेगा।
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सैन्य दायित्वों का सवाल
जहां एक तरफ इसके समर्थक इसे सैन्य क्षमता मजबूत करने का अवसर मानते हैं। वहीं पूर्व राजनयिक एम. हुमायूं कबीर ने चेताया है कि इस गठबंधन में शामिल होना बांग्लादेश की पांच दशक पुरानी संतुलित और गैर-गुटीय विदेश नीति में बदलाव होगा। सबसे संवेदनशील पहलू पाकिस्तान है। सदस्यता लेना सीधे द्विपक्षीय सैन्य गठबंधन में शामिल होना नहीं होगा, लेकिन दोनों देशों की सेनाओं और सुरक्षा प्रतिष्ठानों के बीच सहयोग बढ़ सकता है। इससे ढाका की विदेश नीति पर सवाल खड़े हो सकते हैं। समर्थक इसे व्यापक मुस्लिम दुनिया की सामूहिक सुरक्षा और रणनीतिक क्षमता बढ़ाने का साधन बताते हैं।
भारत की चिंता और सिलिगुड़ी
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि वह मक्का पैक्ट को लेकर सभी घटनाक्रमों पर करीबी नजर बनाए हुए है। बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के पूर्व महानिदेशक केएएस मुर्शिद ने एक लेख में सुझाव दिया है कि ढाका भारत को लिखित आश्वासन दे सकता है कि सिलिगुड़ी कॉरिडोर के आसपास मक्का पैक्ट के साझेदार देशों से जुड़ा कोई सैन्य अड्डा, आवाजाही अधिकार, हवाई सैन्य इस्तेमाल या ढांचा नहीं होगा। ढाका एक ओर सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग के संभावित लाभ देख रहा है, तो दूसरी ओर भारत के साथ अपने व्यापार, संपर्क, ऊर्जा और सुरक्षा हितों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता।