Pakistan PM Shehbaz Sharif Meets US President Joe Biden
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अमेरिका में लीक हुई खुफिया जानकारी से पाकिस्तान सरकार के लिए मुश्किल खड़ी हो गई। यहां पर्यवेक्षकों को अंदेशा है कि इस लीक से पाकिस्तान अमेरिका की सहानुभूति खो सकता है। लीक हुई जानकारी का सार यह है कि पाकिस्तान सरकार के अंदर इस बात को लेकर गहरे मतभेद हैं कि वह अपने को अमेरिका के पाले में रखे या चीन के। आम तौर पर धारणा रही है कि शहबाज शरीफ सरकार बनने के बाद पाकिस्तान अमेरिका के करीब गया है और दोनों देशों के रिश्ते पिछले एक साल में बेहतर हुए हैं।
अमेरिका में बड़ी संख्या में खुफिया दस्तावेज डिस्कॉर्ड मेसेजिंग प्लैटफॉर्म पर लीक हुए हैं। इन दस्तावेजों से यह पता चलता है कि विभिन्न देश अपने अंदरूनी आकलन में इस समय अमेरिका से अपने संबंधों के बारे में क्या समझ रख रहे हैं। लीक हुए दस्तावेजों का संबंध पाकिस्तान के अलावा भारत, ब्राजील और मिस्र से भी है। इन दस्तावेजों के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने रविवार को प्रकाशित की।
पाकिस्तान में हलचल इस बात को लेकर भी मची है कि जो अति गोपनीय टिप्पणी विदेश राज्यमंत्री हिना रब्बानी खार ने विचार-विमर्श के लिए पाकिस्तान सरकार को भेजी, वह अमेरिका पहुंच गई। इसको लेकर कई पर्यवेक्षकों ने संदेह जताया है कि शहबाज शरीफ सरकार के कोई मंत्री या कोई उच्च पदस्थ अधिकारी सरकार की अंदरूनी सूचनाएं अमेरिका भेज रहा है। खार ने अपनी टिप्पणी में सलाह दी थी कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते जा रहे भू-राजनीतिक टकराव के बीच पाकिस्तान को बीच का रास्ता अपनाना छोड़ देना चाहिए।
वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक खार ने यह टिप्पणी बीते मार्च में भेजी थी। इसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान के लिए चीन और अमेरिका के बीच तटस्थ रहना संभव नहीं रह गया है। खार ने यह टिप्पणी ‘पाकिस्तान के सामने कठिन विकल्प’ शीर्षक से तैयार की थी। खार पहले पाकिस्तान की विदेश मंत्री भी रह चुकी हैं।
अपनी हालिया टिप्पणी में उन्होंने कहा कि अब पाकिस्तान को पश्चिम का तुष्टिकरण छोड़ देना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका का साथी बनने का मतलब अपने देश के ‘असल रणनीतिक साझेदारी’ (चीन) की बलि चढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका से संबंध बनाने की कोशिश में पाकिस्तान चीन के साथ अपने संबंध के संपूर्ण लाभों को पाने से वंचित हो जाएगा।
खार ने यह दस्तावेज पाकिस्तान सरकार के अंदर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की तरफ से आयोजित डेमोक्रेसी समिट में शामिल होने या ना होने को लेकर चल रही बहस के सिलसिले में तैयार किया था। पाकिस्तान ने इस शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लिया। यह इस बात का संकेत है कि खार की दलीलों को शरीफ सरकार ने स्वीकार कर लिया। चूंकि यह दस्तावेज अमेरिका के हाथ लग गया, इसलिए उसे यह मालूम हो गया है कि पाकिस्तान ने उससे बनते रिश्तों पर चीन को तरजीह दी है। इसका असर आने वाले दिनों में देखने को मिल सकता है।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल असीम मुनीर ने पिछले हफ्ते चीन की यात्रा की। पिछले हफ्ते ही खबर आई कि चीन ने अपने यहां से पाकिस्तान के ग्वादार तक रेल पटरी बिछाने की परियोजना तैयार कर ली है। इन खबरों से संकेत मिलता है कि पिछले साल पाकिस्तान के अमेरिका के पक्ष में झुकने के मिले संकेत अब कमजोर पड़ रहे हैं। चीन उस पर फिर हावी होता दिख रहा है।