अपने शासनकाल के दौरान पुतिन प्रधानमंत्री (1999) से लेकर राष्ट्रपति बने (2000-2008) और फिर से प्रधानमंत्री बने (2008-2012, इस दौरान उन्होंने संविधान में बदलाव करके राष्ट्रपति के कार्यकाल को चार से बढ़कार छह साल कर दिया था)। इसके बाद पुतिन साल 2012 में फिर से राष्ट्रपति बने। अब पुतिन को फिर से राष्ट्रपति के तौर पर चुना गया है। यह उनका चौथा कार्यकाल होगा जो साल 2024 तक चलेगा। लेकिन, एक केजीबी एजेंट से वो देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति कैसे बने ये जरूर दिलचस्पी का विषय है। उनके इस राजनीतिक सफर में कौन से महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हम यहां बता रहे हैं।
1. ''मॉस्को में खामोशी''
शीत युद्ध की समाप्ति का अंतिम दौर व्लादिमीर पुतिन के उठने के शुरुआती साल थे। 1989 क्रांति के समय वह तत्कालीन साम्यवादी पूर्वी जर्मनी में केजीबी के एजेंट थे। तब उनकी स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी। पुतिन खुद बताते हैं कि कैसे द्रेसदेन में केजीबी के मुख्यालय को भीड़ के घेर लेने पर वो मदद के लिए चिल्लाये थे। उन्होंने मदद के लिए रेड आर्मी टैंक को फोन किया, लेकिन मिखाइल गोर्बाचोव के तहत मॉस्को चुप रहा। तब उन्होंने खुद मॉस्को की तरफ से फैसला ले लिया और कई रिपोर्ट्स जलाने शुरू कर दिए। उन्होंने एक किताब में खुद बताया, ''मैंने खुद बड़ी संख्या में रिपोर्ट्स जलाए। इतने की वहां आग भभक उठी।''
2. रूस के दूसरे बड़े शहर में
वह अपने गृहनगर लेनिनग्राद (बाद में इसका पुराना नाम सेंट पीटसबर्ग रख दिया गया) में लौटने पर पुतिन रातों रात नए मेयर एनातोली सोबचाक के खास बन गए। मेयर अपने पुराने स्टूडेंट को याद करते हैं। उन्होंने पुतिन को राजनीति में पहली नौकरी 1990 में दी थी। साम्यवादी पूर्वी जर्मनी के विघटन के बाद पुतिन ऐसे नेटवर्क का हिस्सा थे जो अपनी भूमिका खो चुका था, लेकिन उन्हें नए रूस में व्यक्तिगत और राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ने के लिए अच्छा मौका दिया गया था। नया
रूस बनने के बाद पुतिन का अनुभव काम अया। उन्होंने पुरानी दोस्ती का फायदा उठाया, नए संपर्क बनाए और नए नियमों के साथ खेलना सीखा। लंबे समय तक वह एनातोली सोबचाक के डेप्युटी रहे।
3. मॉस्को की नजर में आना
पुतिन के करियर का ग्राफ चढ़ना शुरू हो गया था। अपने केजीबी के समय से ही पुतिन जानते थे कि कैसे संभ्रांत लोगों में संपर्क बनाना है। वह अपने गुरू सोबचाक के निधन के बाद मॉस्को चले गए। जहां वह केजीबी के बाद बनी एजेंसी एफएसबी से जुड़ गए। बोरिस येल्तसिन रूस के राष्ट्रपति बने और बाद में पुतिन की उनसे करीबी बढ़ गई। पुतिन अपने संपर्कों और कुशल संचालन क्षमता के कारण बोरिस के नजदीक आते गए।
4. अचानक बने राष्ट्रपति
येल्तसिन का व्यवहार अस्थिर होता जा रहा था और उन्होंने 31 दिसंबर 1999 को इस्तीफा दे दिया। पुतिन को बर्जोवेस्की और अन्य ऑलीगार्क (व्यवसायियों का समूह) का साथ मिल गया। उनकी मदद से पुतिन कार्यकारी राष्ट्रपति बन गए और फिर मार्च 2000 में राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत गए। कारोबारी और येल्तसिन के राजनीतिक परिवार के सुधारक पुतिन के राष्ट्रपति बनने से खुश थे और इसलिए उनकी कुर्सी सुरक्षित थी।
5. मीडिया पर नियंत्रण
पुतिन ने सत्ता में आते ही मीडिया पर नियंत्रण कर लिया। ऐसा होना ऑलीगार्क के लिए झटका था क्योंकि उन्हें पुतिन से ऐसी उम्मीद नहीं थी। इससे ये भी साफ हो गया कि पुतिन आगे किस तरह काम करने वाले हैं। मीडिया पर नियंत्रण करने से पुतिन को दो फायदे हुए। इससे जहां आलोचकों पर नियंत्रण करने में मदद मिली वहीं रूस और पुतिन से जुड़ी खबरें भी उसी तरह सामने आईं जैसा पुतिन चाहते थे। रूसी वही देखते थे जो पुतिन चाहते थे। कुछ लोगों ने स्वतंत्र पत्रकारिता करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बंद कर दिया या ऑनलाइन में शिफ्ट कर दिया गया। इस तरह एक मामला टीवी रेन के साथ हुआ था।