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ये होगा टेरीजा मे का प्लान बी, बेहद आसान शब्दों में समझिए क्या है ब्रेक्जिट

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: Shilpa Thakur Updated Wed, 16 Jan 2019 10:05 AM IST
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Theresa May - फोटो : PTI

ब्रिटेन की संसद में ब्रेक्जिट समझौते पर मंगलवार को हुए ऐतिहासिक मतदान में प्रधानमंत्री टेरीजा मे को करारी हार का सामना करना पड़ा। ये मतदान बीते साल 11 दिसंबर को होना था लेकिन इसे टाल दिया गया था। समझौते के पक्ष में 202 वोट पड़े, जबकि 232 सांसदों ने इसका विरोध किया। इसी के साथ यूरोपीय संघ के साथ ब्रेक्जिट को लेकर किया गया समझौता भी रद्द हो गया। ब्रिटेन को 29 मार्च को यूरोपीय संघ से अलग होना है और ये समय करीब आता जा रहा है।

अभी तक किसी को ये नहीं पता है कि ब्रेक्सिट आखिर होगा कैसे और बहुत संभव है कि अगले सप्ताह के अंत तक भी इस बारे में स्थिति पूरी तरह साफ न हो पाए। लेकिन इस मतदान से दो चीजें पता चल गई हैं,   पहली ये कि टेरीजा मे की योजना का संसद में काफी हद तक विरोध हुआ है और दूसरा ये कि क्या उनके पास वैकल्पिक योजना भी है। लेकिन ये सब बातें समझने से पहले ब्रेक्डिट को समझना अधिक जरूरी है।



क्या है ब्रेक्जिट?

28 देशों की सदस्यता वाले यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर हो जाने को ब्रेक्जिट कहा जा रहा है। इसे दुनिया में ब्रेक्जिट का नाम दिया गया है। जो ब्रिटेन और एक्जिट दो शब्दों से मिलकर बना है। इस मुद्दे पर ब्रिटेन में पहला जनमत संग्रह 23 जून, 2016 को हुआ था। इसमें अधिकतर लोगों ने संघ से अलग होने के पक्ष में मतदान किया था। इसके बाद थेरेसा मे प्रधानमंत्री बनीं। अब ब्रिटेन 29 मार्च 2019 को यूरोपियन संघ से अलग होगा, लेकिन अगर संघ के सभी सदस्य इससे सहमत नहीं होते तो ये टल भी सकता है। 

ये होगा असर

ब्रिटेन के इस फैसले का असर न केवल ब्रिटेन पर बल्कि भारत सहित दुनिया के बाकी देशों पर भी पड़ेगा। अगर ब्रिटेन यूरोपियन संघ से अलग हो जाता है तो पौंड गिर जाएगा जिससे डॉलर की मांग बढ़ेगी। इससे पेट्रोल जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमत बढ़ जाएगी। वहीं भारत सबसे अधिक इसलिए प्रभावित होगा क्योंकि यूरोपियन संघ भारत के लिए सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट है। भारत के आईटी सेक्टर की 16-18 फीसदी कमाई ब्रिटेन से ही होती है। 

इसके अलावा एक दूसरा असर पड़ेगा लोगों की यात्राओं पर। यूरोपियन यूनियन में शामिल देश के नागरिक बिना वीजा के यूरोप के किसी भी देश में बेरोकटोक घूम सकते हैं। लेकिन इससे अलग होने के बाद ब्रिटेन के लोगों को यूरोप के देशों में यात्रा करने के लिए वीजा की आवश्यकता पड़ेगी। इसका सीधा असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान झेलना पड़ा सकता है।

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Theresa May - फोटो : PTI
ब्रिटेन की संसद में ब्रेक्जिट समझौते पर मंगलवार को हुए ऐतिहासिक मतदान में प्रधानमंत्री टेरीजा मे को करारी हार का सामना करना पड़ा। ये मतदान बीते साल 11 दिसंबर को होना था लेकिन इसे टाल दिया गया था। समझौते के पक्ष में 202 वोट पड़े, जबकि 232 सांसदों ने इसका विरोध किया। इसी के साथ यूरोपीय संघ के साथ ब्रेक्जिट को लेकर किया गया समझौता भी रद्द हो गया। ब्रिटेन को 29 मार्च को यूरोपीय संघ से अलग होना है और ये समय करीब आता जा रहा है।

अभी तक किसी को ये नहीं पता है कि ब्रेक्सिट आखिर होगा कैसे और बहुत संभव है कि अगले सप्ताह के अंत तक भी इस बारे में स्थिति पूरी तरह साफ न हो पाए। लेकिन इस मतदान से दो चीजें पता चल गई हैं,   पहली ये कि टेरीजा मे की योजना का संसद में काफी हद तक विरोध हुआ है और दूसरा ये कि क्या उनके पास वैकल्पिक योजना भी है। लेकिन ये सब बातें समझने से पहले ब्रेक्डिट को समझना अधिक जरूरी है।

क्या है ब्रेक्जिट?

28 देशों की सदस्यता वाले यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर हो जाने को ब्रेक्जिट कहा जा रहा है। इसे दुनिया में ब्रेक्जिट का नाम दिया गया है। जो ब्रिटेन और एक्जिट दो शब्दों से मिलकर बना है। इस मुद्दे पर ब्रिटेन में पहला जनमत संग्रह 23 जून, 2016 को हुआ था। इसमें अधिकतर लोगों ने संघ से अलग होने के पक्ष में मतदान किया था। इसके बाद थेरेसा मे प्रधानमंत्री बनीं। अब ब्रिटेन 29 मार्च 2019 को यूरोपियन संघ से अलग होगा, लेकिन अगर संघ के सभी सदस्य इससे सहमत नहीं होते तो ये टल भी सकता है। 

ये होगा असर

ब्रिटेन के इस फैसले का असर न केवल ब्रिटेन पर बल्कि भारत सहित दुनिया के बाकी देशों पर भी पड़ेगा। अगर ब्रिटेन यूरोपियन संघ से अलग हो जाता है तो पौंड गिर जाएगा जिससे डॉलर की मांग बढ़ेगी। इससे पेट्रोल जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमत बढ़ जाएगी। वहीं भारत सबसे अधिक इसलिए प्रभावित होगा क्योंकि यूरोपियन संघ भारत के लिए सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट है। भारत के आईटी सेक्टर की 16-18 फीसदी कमाई ब्रिटेन से ही होती है। 

इसके अलावा एक दूसरा असर पड़ेगा लोगों की यात्राओं पर। यूरोपियन यूनियन में शामिल देश के नागरिक बिना वीजा के यूरोप के किसी भी देश में बेरोकटोक घूम सकते हैं। लेकिन इससे अलग होने के बाद ब्रिटेन के लोगों को यूरोप के देशों में यात्रा करने के लिए वीजा की आवश्यकता पड़ेगी। इसका सीधा असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान झेलना पड़ा सकता है।

संसद ने किस मुद्दे पर मतदान किया?

British parliament
पीएम टेरीजा मे के समझौते के दो हिस्से हैं, जिसमें से एक कानूनी तौर पर बाध्य निकासी समझौता है, जिसमें ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने की शर्ते हैं और दूसरा गैर बाध्यकारी घोषणापत्र जिसमें यूरोपीय संघ के साथ भविष्य के रिश्तों को लेकर ब्रिटेन की उम्मीदें हैं।

टेरीजा मे की कंजरवेटिव पार्टी के जो सांसद ब्रेक्जिट का समर्थन कर रहे हैं, उनका कहना है कि टेरीजा मे का समझौता ब्रिटेन को यूरोपीय संघ के करीब रखेगा जबकि ब्रेक्जिट के विरोधी कंजरवेटिव सांसदों और सभी विरोधी दलों का कहना है कि घोषणापत्र बेहद अस्पष्ट है।

मे के खिलाफ भारतीय मूल के अधिकतर सांसद

संसद में मौजूद भारतीय मूल के अधिकतर सांसदों ने पीएम टेरिजा मे के खिलाफ वोट डाला है। इन सांसदों में से सात लेबर पार्टी के हैं और बाकी के तीन सत्तारूढ़ पार्टी के हैं। वहीं दो सासंदों ने पीएम के हक में वोट डाला है। संसद के रिकॉर्ड के अनुसार इनके नाम आलोक शर्मा और ऋषी सुनक है।

शर्मा रोजगार विभाग में राज्यमंत्री हैं और सुनक हाउसिंग, कम्युनिटी एंड लोकल गवर्नमेंट में जूनियर मिनिस्टर। बता दें सुनक इन्फोसिस के को फाउंडर एनआर नारायण मूर्ति के दामाद हैं। वहीं सत्तारूढ़ पार्टी के वो तीन भारतीय मूल के सांसद जिन्होंने पीएम के खिलाफ में वोट डाला है, उनके नाम हैं प्रीती पटेल, शैलेश वरा और सुएला ब्रेवरमेन। वरा और ब्रेवरमेन ने बीते साल नवंबर में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने समझौते के पब्लिश होने के बाद ये कदम उठाया। 

लेबर पार्टी के वरिष्ठ सांसद वीरेंद्र शर्मा ने वोटिंग के नतीजों के बाद कहा, "इस शाम ये साबित हुआ है कि संसद में पीएम के लिए कोई बहुमत नहीं है और ब्रेक्जिट के लिए कोई भी डील नहीं है।"

अब क्या होगा टेरीजा मे का प्लान बी?

theresa may - फोटो : PTI
समझौता खारिज होने के तुरंत बाद विपक्षी लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी पेश कर दिया, जिसे टेरीजा मे ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि वह बुधवार को इसका सामना करेंगी और जवाब भी देंगी, जिसे कॉर्बिन ने भी स्वीकार कर लिया। मे ने तंज कसते हुए कहा कि उन्हें अपनी हार का पता था। लेकिन, वह यह नहीं जानतीं कि सांसद अगर ब्रेक्जिट का समर्थन नहीं करेंगे तो किसका करेंगे। 

मतदान से पहले टेरीजा मे ने सासंदों से इस प्रस्ताव पर फिर से विचार करने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा था, ‘यह पूरी तरह सही नहीं है, लेकिन वास्तव में यही बीच का रास्ता है। जब इतिहास लिखा जाएगा, तो लोग संसद के फैसले को देखेंगे और पूछेंगे, क्या हमने यूरोपीय संघ को छोड़ने के लिये मतदान किया या देश की जनता को निराश किया है।

अब ये संभावना है कि बुधवार को लेबर पार्टी के अविश्वास प्रस्ताव से बचने के अलावा टेरीजा मे सोमवार को प्लान बी के साथ आ सकती हैं। मंगलवार की रात ये साफ हो गया कि बेशक उनकी पार्टी के सांसदों ने उनके विरोध में वोट डाला है लेकिन वह अविश्वास प्रस्ताव के लिए होने वाली वोटिंग में मे के हक में वोट डालेंगे। बुधवार की रात ये सांसद अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में वोट डाल सकते हैं।

10 सदस्यीय डेमोक्रेटिक यूनिअनिस्ट पार्टी ने समझौते में मे के खिलाफ वोट डाला लेकिन साथ ही अविश्वास प्रस्ताव में मे के समर्थन की घोषणा की है। उम्मीद है कि वह ब्रसेल्स में बातचीत के बाद संसद के सामने एक नई डील लेकर आएंगी। हाउस ऑफ कॉमन्स में कन्जरवेटिव पार्टी और डीयूपी का बहुमत है।

इसके साथ ही मे के पास अपने समझौते को दोबारा पारित कराने, नया समझौता करने, कोई समझौता न करने या फिर यूरोपीय संघ से अलग होने के मुद्दे पर देश में दोबारा जनमत संग्रह कराने और ब्रेक्सिट को टाल देने के विकल्प भी हैं।

कैसे होगा ब्रेक्जिट?

European Union - फोटो : Reuters
ये किसी को नहीं पता है कि ब्रेक्जिट कैसे होगा। साधारण शब्दों में कहें तो, जनमत संग्रह के ढाई साल बाद भी सांसद ये तय नहीं कर पाएं हैं कि इसके नतीजे का क्या करें। ये इतना ही सरल है और इसी से पता चलता है कि ब्रिटेन 1954 के बाद के सबसे बड़े राजनीतिक संकट में कैसे घिर रहा है लेकिन अगर कुछ नहीं हुआ तो इसका मतलब ये है कि ब्रिटेन को बिना समझौते के ही यूरोपीय संघ से अलग होना पड़ेगा।

और अगर अंत में टेरीजा मे बिना समझौते के यूरोपीय संघ से अलग होने के लिए तैयार न हो पाईं और अगर संसद इसे रोकने के लिए आतुर रही तो फिर किसी को नहीं पता कि क्या होगा। कुछ तो होगा, लेकिन क्या होगा, ये कहना अभी मुश्किल है।

मुख्य विपक्षी पार्टी में क्या चल रहा है?

ब्रेक्जिट ने न सिर्फ सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी में मतभेद पैदा किए हैं बल्कि मुख्य विपक्षी लेबर पार्टी में भी दरार डाल दी है। यूरोपीय संघ के विरोधी जेरेमी कोर्बिन की छाया में पार्टी नेतृत्व किसी भी तरह से यूरोपीय संघ से अलग होना चाहता है लेकिन पार्टी के अधिकतर सदस्य और समर्थक चाहते हैं कि दोबारा जनमत संग्रह हो और ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से अलग होने से रोका जाए।

हाऊस ऑफ कामंस के स्पीकर से विवाद

ब्रेक्जिट पर इसी सप्ताह स्पीकर जॉन बेक्रो और ब्रेक्जिट समर्थक सांसदों के बीच विवाद हुआ। स्पीकर पर यूरोपीय संघ से अलग होने के खिलाफ होने के आरोप भी लगे हैं। उन्होंने कहा था कि वो चाहते हैं कि ब्रेक्जिट के प्रबंधन में संसद की भूमिका और अधिक हो। ये महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद अभी तक बिना समझौते के यूरोपीय संघ से अलग होने और टेरीजा मे के समझौते, दोनों के ही खिलाफ रही है।
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