कराची विश्वविद्यालय में मंगलवार को हुए आत्मघाती हमले से दो बातें और भी खुल कर जाहिर हुई हैं। इससे पहला संकेत यह मिला है कि बलूचिस्तान में चीन विरोधी भावनाएं किस हद तक उबल रही हैं। इसके अलावा इस पहलू पर भी फिर रोशनी पड़ी है कि बलूचिस्तान के जनमानस में पाकिस्तान से अलगाव लगातार गहरा रहा है।
शुरुआत में शारी के ट्विट पर बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया था, क्योंकि उन्हें उसका मतलब समझ में नहीं आया। लेकिन हमले के बाद शारी पूरे पाकिस्तान में चर्चा का विषय बन गई। टीकाकारों ने कहा है कि बलूचिस्तान में अशांति और हिंसक का माहौल कोई छिपी बात नहीं है। लेकिन फिदायीन जिस पृष्ठभूमि से आई, उसे देखते हुए उस प्रांत में फैल रही पाकिस्तान और चीन विरोधी भावनाओं का नए सिरे से अंदाजा लगा है।
बलूचिस्तान की जनता का एक बड़ा हिस्सा वहां चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडोर के तहत बन रही परियोजनाओं का विरोध कर रहा है। वहां के लोगों की शिकायत है कि इन परियोजनाओं के कारण उनका पर्यावरण खराब हुआ है, जबकि इनसे वहां के लोगों को कोई लाभ नहीं पहुंचा है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) वहां इन परियोजनाओं और उनसे जुड़े लोगों को लगातार निशाना बनाती रही है। विशेषज्ञों ने कहा है कि शारी बलोच में जैसी विद्रोही सोच भरी, वैसा एक-दो दिन में नहीं होता है।
शारी अपने छात्र जीवन के समय बलूच स्टूटेंड्स ऑर्गनाइडेशन से जुड़ी थी। लेकिन सुरक्षा बलों के पास इस बात के कोई सुराग नहीं थे कि उसका संबंध बीएलए से भी है। जबकि कराची यूनिवर्सिटी में हमले के कुछ देर बाद बीएलए ने इसकी जिम्मेदारी ली।
टीकाकार शहबुल्लाह यूसुफजई और हसन सिद्दीकी ने एक विश्लेषण में कई अहम सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है- ‘हमलों के लिए महिलाओं के उपयोग से कई सवाल खड़े हुए हैः क्या बलूच विद्रोह अब नया रूप ले रहा है? अब हमलों के लिए महिलाओं का इस्तेमाल क्यों शुरू किया गया है और पहले उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? क्या इन महिलाओं का ब्रेनवॉश किया गया है या उन्हें जबरन ऐसे काम में लगाया जा रहा है?’
कई दूसरे विश्लेषकों का कहना है कि शारी जिस पृष्ठभूमि से आई और जिस तरह उसे हमले के पहले ट्विट किया, उससे ऐसा नहीं लगता कि उसने यह काम किसी जोर-जबर्दस्ती के कारण किया होगा। बल्कि इससे बलूचिस्तान में पाकिस्तान और चीन के खिलाफ भड़क रही भावनाओं का संकेत मिला है।