राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस साल सितंबर तक अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का एलान करते हुए कहा है कि यह सबसे लंबे युद्ध को खत्म करने का वक्त है। उन्होंने कहा, हमारा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अफगानिस्तान आतंकवाद का लांचिंग पैड नहीं होगा और अमेरिका ने अपना मिशन पूरा किया है। अब यह अमेरिकी सैनिकों की घर वापसी का समय है।
बाइडन ने राष्ट्र के नाम संबोधन में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की घोषणा करते हुए कहा, अब अफगानिस्ता अमेरिकी बलों को खून और पैसों की लागत पर छोड़ने लायक नहीं रह गया है। उन्होंने कहा, 11 सितंबर (2001) की घटना के 20 साल पूरे होने से पहले अमेरिकी सैनिकों के साथ नाटो देशों और अन्य सहयोगी देशों के सैनिक भी अफगानिस्तान से वापस आएंगे। राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने दो दशक पूर्व 9/11 हमलों के बाद यहां आतंकवाद के खिलाफ युद्ध शुरू करने का आदेश दिया था, जिसका अब कोई औचित्य नहीं रह गया है। एक मई से शुरू होने वाली प्रक्रिया के तहत अफगानिस्तान में तैनात करीब 2,500 अमेरिकी सैनिक धीरे-धीरे वापस बुलाए जाएंगे। इसके बाद बाइडन ने आर्लिंगटन नेशनल सिमेट्री (सैन्य स्मारक) जाकर, अफगानिस्तान युद्ध में जान गंवाने वाले अमेरिकी सैनिकों को श्रद्धांजलि दी।
भारत, पाक व अन्य देशों की अफगानिस्तान के भविष्य में अहम जिम्मेदारी
राष्ट्र के नाम संबोधित करते हुए जो बाइडन ने कहा कि भारत, पाकिस्तान, रूस, चीन और तुर्की का अफगानिस्तान के स्थिर भविष्य में अहम योगदान है। इन क्षेत्रीय हितधारकों को इस युद्धग्रस्त देश में शांति लाने के लिए और अधिक कोशिशें करनी चाहिए जहां से वह अपनी सेना को 11 सितंबर तक वापस बुलाने जा रहा है।
उन्होंने कहा, हम क्षेत्र के अन्य देशों को अफगानिस्तान का समर्थन करने के लिए कहेंगे, खासकर पाकिस्तान से और साथ ही रूस, चीन, भारत व तुर्की से जिनकी अफगानिस्तान के स्थिर भविष्य में अहम हिस्सेदारी है। फिलहाल अफगानिस्तान में करीब 2,500 अमेरिकी सैनिक हैं जो बराक ओबामा के कार्यकाल में एक लाख से अधिक थे। उधर, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव जेन साकी ने कहा, मौजूदा हालात में अफगानिस्तान को सैन्य समाधान की नहीं, बल्कि राजनयिक समाधान की जरूरत है। साकी ने कहा, हम राजनयिक व मानवीय कार्यों का समर्थन जारी रखेंगे, साथ ही भारत-पाक व अन्य देशों को कदम बढ़ाने के लिए कहेंगे।
भारत की भूमिका की प्रशंसा
अमेरिकी राष्ट्रपति ने हमने अफगानिस्तान में अपने मकसद को हासिल किया है। बाइडन ने अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में भारत की तारीफ करते हुए कहा कि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत सबसे बड़ा क्षेत्रीय योगदानकर्ता रहा है। युद्धग्रस्त देश में शांति और विकास में भी भारत की भूमिका प्रशंसनीय रही है। हालांकि उन्होंने अमेरिकी सैन्य वापसी के बाद भारत की भूमिका का ज्यादा विवरण नहीं दिया।
विशेषज्ञों ने भारत के लिए जताई चिंता
अमेरिका और नाटो के अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने के बाद तालिबान और क्षेत्र को आतंकियों द्वारा सुरक्षित पनाहगाह के रूप में इस्तेमाल किए जाने के चलते भारत को जबरदस्त चिंता होगी। ट्रंप प्रशासन में राष्ट्रपति की उपसलाहकार रहीं लीजा कर्टिस ने कहा, अमेरिकी फैसले से भारत को इसलिए चिंता होगी क्योंकि 1990 के दशक में अफगानिस्तान पर तालिबान के नियंत्रण के वक्त उसने आतंकियों को पनाह दी और उन्हें प्रशिक्षित किया। लश्कर और जैश समेत कई आतंकी संगठनों से भारत में 2001 में संसद पर हमला कराया गया। 1999 में विमान अपहरण कांड भी हुआ। अमेरिका के लिए पाक के पूर्व राजदूत और हडसन इंस्टीट्यूट थिंक-टैंक में दक्षिण एवं मध्य एशिया मामलों के निदेशक हुसैन हक्कानी ने कहा, तालिबान के कब्जे वाले क्षेत्र के आतंकियों की पनाहगाह बनने से भारत का चिंतित होना लाजमी है।
खतरनाक हो सकते हैं नतीजे
‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने कहा है कि लंबे समय तक आतंकवादी संगठनों पर रोक लगा पाना मुश्किल हो सकता है। ऐसा ही कुछ विचार वाल स्ट्रीट जर्नल ने भी प्रकाशित किया है। जबकि वाशिंगटन पोस्ट ने कहा, राष्ट्रपति बाइडन ने अफगानिस्तान से हटने का सबसे आसान तरीका चुना लेकिन इसके नतीजे खतरनाक हो सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया भी बुलाएगा शेष बचे 80 सैनिक
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने बृहस्पतिवार को कहा कि अमेरिका और अन्य सहयोगियों की तरह हम भी अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने का काम सितंबर तक पूरा कर लेेंगे। नाटो नीत मिशन में ऑस्ट्रेलिया का योगदान एक वक्त में 15,000 सैनिकों के पार चला गया था लेकिन अब वहां 80 ही कर्मी बचे हैं। इन अंतिम बचे सैनिकों की वापसी भी जल्द शुरू हो जाएगी।