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Jimmy Carter: बतौर राष्ट्रपति वाहवाही नहीं बटोर पाए जिमी, बाद में मिला नोबेल; विदेश नीति में प्रतिष्ठा भी बढ़ी

Mon, 30 Dec 2024 12:17 PM IST
काव्या मिश्रा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन

सार

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर का निधन हो गया। उनकी विदेश नीति की दृष्टि और उनके कार्य आज भी वैश्विक चर्चा का विषय बने हुए हैं। उनका मानवीय दृष्टिकोण एक प्रेरणा बन गया है।  
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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर का निधन। - फोटो : x/@CarterCenter
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विस्तार
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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर का 100 साल की उम्र में निधन हो गया। वह अमेरिका के 39वें राष्ट्रपति थे। वह इस पद पर 1977 से 1981 तक रहे। हालांकि, कार्टर से जुड़ी दिलचस्प बात यह है कि जब वह राष्ट्रपति थे, तब उनके कदमों को कभी ज्यादा नहीं सराहा गया। मगर बाद में उन्हें मानवीय कार्यों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला। इतना ही नहीं, उन्हें इस्राइल और मिस्र के बीच शांति स्थापित करने का श्रेय भी दिया गया। आइए जानते हैं सबकुछ

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क्या मानना था कार्टर का?
दिसंबर 1978 में कार्टर ने इस बात पर विश्वास जाहिर किया था कि अमेरिकी रणनीतिक निर्णयों को विदेश नीति में मानवाधिकारों के पालन के आधार पर आकार देना चाहिए। उन्होंने कहा था, 'मानवाधिकार हमारी विदेश नीति की आत्मा है क्योंकि मानवाधिकार हमारी राष्ट्रीय पहचान की आत्मा है।'

विदेश मामलों में रहे शानदार योगदान
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति के विदेशी मामलों में कुछ उल्लेखनीय योगदान रहे। सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि 1978 के कैंप डेविड समझौते के रूप में सामने आई। इस समझौते में कार्टर, इस्राइली प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन और मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात ने हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत बेगिन ने 1967 के छह दिन युद्ध में इस्राइल द्वारा कब्जा किए गए सिनाई प्रायद्वीप को मिस्र को सौंपने का वादा किया था, जिसके बदले में मिस्र ने शांति और पूर्ण कूटनीतिक रिश्ते स्थापित किए।
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25 साल बाद मिला सम्मान
यह समझौता कार्टर के इस विश्वास को दिखाता है कि अमेरिकी कूटनीति से शांति स्थापित की जा सकती है और राष्ट्रपति को संघर्ष समाधान के लिए साहसिक कदम उठाने चाहिए। राष्ट्रपति कार्यकाल के बाद उनका विदेश नीति में योगदान और मानवाधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता बढ़ी। आखिरकार 25 साल बाद उनकी मेहनत रंगव लाई। साल 2002 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जहां उनकी कोशिशों को सराहा गया। नोबेल समिति ने कहा, 'कार्टर को शांति वार्ताओं, मानवाधिकारों के प्रचार और सामाजिक कल्याण के लिए उनके प्रयासों के लिए यह पुरस्कार दिया गया है।'

क्यों की थी कार्टर सेंटर की स्थापना?
जनवरी 1981 में पद छोड़ने के बाद कार्टर ने पूर्व राष्ट्रपति के रूप में उन मुद्दों पर काम किया जो उनके लिए सबसे अहम थे। उन्होंने व्यक्तिगत कूटनीति के मार्ग को आगे बढ़ाने के लिए कार्टर सेंटर की स्थापना की। 1982 में शुरू हुए इस केंद्र ने 39 देशों में 110 से अधिक चुनावों की निगरानी की है। उन्होंने उत्तर कोरिया और लीबिया जैसे देशों के साथ कूटनीतिक प्रयास किए और 1994 में उत्तर कोरिया के नेता किम इल-सुंग से मुलाकात की, जिससे अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच परमाणु समझौता हुआ।

मानवाधिकारों और वैश्विक शांति के प्रति समर्पण
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने अपने कार्यकाल के बाद से वैश्विक शांति, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। वह 'द एल्डर्स' नामक एक स्वतंत्र समूह के सदस्य रहे, जिसका उद्देश्य शांति प्रचार, सामाजिक न्याय, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक मानवाधिकारों को बढ़ावा देना था। इस समूह के साथ अपने सक्रिय सदस्यता के दौरान, कार्टर ने इस्राइल-फलस्तीनी संघर्ष पर विशेष ध्यान दिया और कई बार उस क्षेत्र का दौरा किया।

परमाणु हथियारों की बढ़ती तनावपूर्ण स्थिति...
1990 के दशक के शुरुआत में, कार्टर ने अमेरिकी राज्य विभाग और कुछ देशों जैसे उत्तर कोरिया और लीबिया के बीच मध्यस्थता की। 1994 में, उन्होंने उत्तर कोरियाई नेता किम इल सुंग के साथ परमाणु हथियारों की बढ़ती तनावपूर्ण स्थिति को हल करने के लिए अमेरिकी सरकार के कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन किया। कार्टर ने जून 1994 में किम से मुलाकात की, जो देश का दौरा करने वाले पहले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बन गए। इस यात्रा ने उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच एक अंतिम द्विपक्षीय समझौते की नींव रखी। इस समझौते में उत्तर कोरिया ने अपने प्लूटोनियम हथियार कार्यक्रम को रोकने का वादा किया, जबकि अमेरिका ने सहायता देने पर सहमति व्यक्त की।

कार्टर की विदेश नीति की दृष्टि और उनके कार्य आज भी वैश्विक चर्चा का विषय बने हुए हैं, और उनका मानवीय दृष्टिकोण एक प्रेरणा बन गया है। उनका जीवन यह दर्शाता है कि कैसे एक राष्ट्राध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी वह वैश्विक कूटनीति और मानवाधिकारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

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