समंदर, हमारी धरती के 71 फीसदी विस्तार में फैले हुए हैं। ये जिंदगी से लबरेज हैं। संसाधनों से भरे हुए हैं। अब तक समुद्र में रहने वाले करीब ढाई लाख जीवों की पहचान हो चुकी है। लेकिन, समुद्र के जानकार कहते हैं कि इंसान ने अब तक समंदर का केवल पांच फीसदी हिस्सा ही जाना है।
गर्म पानी के सोते तो बंद हो चुके हैं। लेकिन, इन छोटी-छोटी सुरंगों के भीतर इंसान के काम की बहुत सी चीजें छुपी हैं। इनमें कई महंगे और दुर्लभ खनिज मिलने की संभावना है। धरती पर घटते खनिज भंडारों को देखते हुए अब गहरे समुद्र से खनिज निकालने के काम में बहुत से लोग और देश दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
दिक्कत ये है कि अभी तकनीक इतनी विकसित नहीं हुई है कि इन सुराखों से आसानी से जिंक के अयस्क को निकाला जा सके। फिर, गहरे समुद्र में खुदाई के और भी खतरे हैं। सबसे बड़ा खतरा तो वहां के जीवों के खात्मे का है।
समुद्र की तलहटी में मौजूद सल्फाइड के ये भंडार उस जगह हैं, जहां धरती की टेक्नोनिक प्लेट से निकलने वाली गर्मी की वजह से पानी गर्म होकर सुराखों से निकलता है। पानी जिन चट्टानों से होकर गुजरता है, उनमें मौजूद खनिजों को खुरचता चलता है। इसी वजह से समुद्र की तलहटी में खनिज के भंडार जमा होने लगते हैं।
ओकिनावा के समुद्र तट के करीब इन गर्म पानी के सोतों को 1977 में खोजा गया था। उस वक्त ये सक्रिय थे। तब भी गहरे समुद्र में जिंदगी खूब आबाद थी। वहां पर खोजकर्ताओं को दो मीटर से भी लंबे कीड़े, सफेद केकड़े और मछलियां मिली थीं। इनके अलावा वहां पर अनगिनत छोटे जीवों की नस्लें भी आबाद थीं। ये जीव, गर्म पानी में रहने के आदी हो चुके थे।
समुद्र की गहराई में मौजूद ये सुराख वक्त के साथ गर्म पानी निकालना बंद कर देते हैं। इन्हीं बंद सोतों में जमा खनिज की तलाश में गहरे समुद्र में खुदाई के अभियान चलाए जा रहे हैं। जापान में कुदरती संसाधनों की भारी कमी है। अपनी अयस्कों की जरूरत जापान आयात से पूरी करता है।
इसी वजह से जापान की सरकार गहरे समुद्र में खुदाई करके खनिज हासिल करना चाहती थी। इसकी संभावनाएं तलाशने के लिए 2013 में ही जापान की सरकार ने एक रिसर्च प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी थी।
ये तो पता है कि समुद्र की तलहटी में खनिज के भंडार हैं। दिक्कत ये है कि इन्हें बिना समुद्री जीवों को नुकसान पहुंचाए, निकाला कैसे जाए?
ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे के पॉल लस्टी कहते हैं कि समुद्र की गहराई में जमा खनिज की तलाश आसान काम नहीं। जब इन सुराखों से गर्म पानी निकलता है, तो उसमें से खनिज के अवशेष नहीं मिलते। और जब गर्म पानी निकलना बंद हो जाता है, तो भी इन सुराखों के मुहाने पर ऐसी चीजें नहीं जमा होतीं कि पता लग सके कि कहां खनिज के कितने भंडार हैं।
समुद्र की गहराई का माहौल बेहद चुनौतीभरा होता है। तीन से चार हजार मीटर की गहराई में खुदाई करना आसान काम नहीं है। पहले तो इन खनिजों के भंडारों का पता लगाना होगा। फिर, इन्हें निकालने की जुगत भिड़ानी होगी। इसके लिए नई तकनीकों का विकास किया जा रहा है।
टोक्यो की जियोफिजिकल सर्वे कंपनी जेजीआई के ईची असाकावा कहते हैं कि आवाज की तरंगों की मदद से समुद्र की तलहटी की पड़ताल करने वाले उपकरण विकसित किए जा रहे हैं। जहां पर खनिज मिलेगा, वहां ये तरंगें थोड़ा घूम जाएंगी।
कुछ कंपनियां इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरीकों से भी समुद्र की तलहटी को छान रहे हैं। जापान की सरकारी तेल, गैस और धातु कंपनी ने ऐसे छह ठिकानों का पता लगाया है, जहां पर खुदाई की जा सकती है। इन में से एक ठिकाने से करीब 1600 मीटर की गहराई से थोड़ा सा खनिज निकाला भी गया था।
वैज्ञानिक समुद्र की गहराई में खुदाई को बेहद खतरनाक बता रहे हैं। वो कहते हैं कि इससे गहरे समुद्र में रहने वाले जीवों को खतरा है। उनका पूरा इकोसिस्टम तबाह हो जाएगा। समुद्र की तलहटी के इकोसिस्टम को पूरी तरह समझे बिना खुदाई से भारी नुकसान भी हो सकता है। इससे आस-पास के सक्रिए गर्म पानी के सुराखों को भी नुकसान हो सकता है।
पॉल लस्टी मानते हैं कि जिन सोतों से गर्म पानी निकलना बंद हो चुका है, उनमें भी जिंदगियां आबाद होती हैं। जिन जगहों पर खुदाई की संभावनाएं हो सकती हैं, उनके लिए गाइडलाइन तय की जा रही हैं। ये काम इंटरनेशन सीबेड अथॉरिटी कर रही है।
जब ये गाइडलाइन तय होंगी, तो समुद्र तटीय इलाकों में ही मान्य होंगी। सुदूर समंदर में तो हर देश अपने हिसाब से चलता है।
गहरे समुद्र में खुदाई की वजह से कंकड़-पत्थर का गुबार उठने का डर है। इससे समुद्री जीवों की जान पर बन आएगी। फिर चौबीसों घंटे खुदाई चलने से वहां की लाइफ-साइकिल में भी खलल पड़ेगा।
पर, पॉल लस्टी का कहना है कि समुद्र के इकोसिस्टम के इस नुकसान को दूसरे तरीके से देखने की जरूरत है। समुद्र में खुदाई से प्रदूषण कम होगा।
आज धरती पर गहरी खदानों से खनिज निकालने में जितनी ऊर्जा खर्च होती है, उसके मुकाबले समुद्र की खुदाई से पर्यावरण का प्रदूषण करीब एक चौथाई तक कम हो जाएगा। फिर, धरती के मुकाबले समंदर से निकलने वाले खनिज की गुणवत्ता भी बेहतर होगी।
धरती पर कम होते खनिजों की किल्लत को समुद्र में खुदाई कर के ही पूरा किया जा सकता है। जैसे कि तांबा, जिसकी दुनिया में भारी मांग है।
पॉल लस्टी कहते हैं कि समुद्र में खुदाई से हम पर्यावरण को बहुत ही कम नुकसान पहुंचाएंगे। खनिज हमारी तरक्की और सभ्यता की स्थिरता के लिए बहुत जरूरी हो गए हैं। आज विकास का पहिया घूमते रहने के लिए हम इन पर निर्भर हैं।
जापान फिलहाल खुदाई से ज्यादा खनिजों की संभावनाएं तलाशने पर जोर दे रहा है। लेकिन, इन गर्म पानी के सुराखों में अपार संभावनाएं दिखती हैं। हो सकता है कि आगे चलकर इनकी खुदाई करके खनिज निकालने का काम भी शुरू हो सके।