इटली में गियोर्गिया मेलोनी के नेतृत्व वाली धुर दक्षिणपंथी पार्टी- ब्रदर्स ऑफ इटली की लगातार बढ़ रही लोकप्रियता से देश के मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान की चिंताएं बढ़ रही हैं। अब ये आम अनुमान लगाया जा रहा है कि 25 सितंबर को होने वाले आम चुनाव में ब्रदर्स ऑफ इटली के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत होगी और उसके बाद मेलोनी प्रधानमंत्री बनेंगी। इटली यूरोपियन यूनियन (ईयू) के भीतर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
विश्लेषकों ने कहा है कि इटली के चुनाव नतीजे का इटली के साथ-साथ ईयू के लिए भी दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। ब्रदर्स ऑफ इटली के गठबंधन में मेतियो सेल्विनी के नेतृत्व वाली आव्रजन विरोधी पार्टी और सिल्वियो बर्लुस्कोनी के नेतृत्व वाली दक्षिणपंथी फोर्जा इटालिया पार्टी भी शामिल हैं। मेलोनी की पार्टी की पहचान ‘पोस्ट फासिस्ट’ नेता के रूप में है। पोस्ट फासिस्ट विचारधारा मूल फासीवादी विचारधारा का ही नया रूप है, लेकिन इस विचारधारा को मानने वाली पार्टियां संवैधानिक राजनीति में भाग लेती हैं।
ब्रदर्स ऑफ इटली पार्टी को 2018 के आम चुनाव में सिर्फ चार फीसदी वोट मिले थे। लेकिन अब जनमत संग्रहों में उसे तकरीबन 25 फीसदी वोट मिलने का अनुमान लगाया गया है। इस पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन को 48 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है। इस गठबंधन का मुकाबला मध्यमार्गी-वामपंथी दलों के गठबंधन से है, जिसे सिर्फ 29 फीसदी मतदाताओं का समर्थन मिलता बताया गया है।
मेलोनी 45 साल की हैं और इस चुनाव के दौरान उन्होंने पोस्ट फासिस्ट विचारधारा से खुद को अलग दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि इटली फासीवादी विचारधारा को इतिहास में पीछे छोड़ चुका है। इसके बावजूद वे हंगरी के उग्र राष्ट्रवादी नेता विक्टर ऑर्बन की खुलेआम तारीफ करती हैँ। ऑर्बन समलैंगिक अधिकारों के कट्टर विरोधी हैं। साथ ही आव्रजकों का आना रोकने के लिए वे नौसेना का इस्तेमाल करने की इच्छा जता चुके हैं।
मेलोनी ने अतीत में अपनी पार्टी को किसी सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनाया। समझा जाता है कि हमेशा विपक्ष की राजनीति में रहने का लाभ अब उन्हें मिल रहा है। इस चुनाव में वे ईसाइयत और जन्मभूमि के प्रति समर्पण, तथा यूरोप का कम प्रभाव घटाने और बेहतर यूरोप बनाने के नारे के साथ मैदान में उतरी हैं। उनके नारों से इटली के अभिजात्य वर्ग में बेचैनी है।
इटली में 2018 में नया चुनाव कानून लागू हुआ था। उसके मुताबिक संसद के ऊपरी और निचले सदन के एक तिहाई सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचन विधि से चुने जाते हैं। बाकी सीटें दलों को मिले वोट प्रतिशत के अनुपात में उन्हें आवंटित होती हैं। पार्टियों को अकेला या गठबंधन के रूप में चुनाव लड़ने की इजाजत है। अकेले लड़ी पार्टियों को संसद में सीट पाने के लिए कम से कम तीन फीसदी वोट पाने की शर्त है। गठबंधनों के मामले में ये संख्या 10 फीसदी है।
इस साल निचले सदन की सदस्य संख्या 630 से घटा कर 400 कर दी गई है। ऊपरी सदन सीनेट के सदस्यों संख्या 315 से घटा कर 200 कर दी गई है। समझा जाता है कि इस चुनाव में छोटी पार्टियां महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।