विश्लेषकों कहना है कि अगर जॉनसन अपने रुख पर अड़े रहे, तो उससे एक बड़ा संवैधानिक संकट तैयार हो सकता है। स्टरजन ने दो टूक कहा है कि जनमत संग्रह उनका मुख्य एजेंडा होगा। कंजरवेटिव पार्टी इससे इनकार करेगी। इसका संकेत उसकी स्कॉटलैंड शाखा के नेताओं के बयानों से मिला है। असेंबली के नव-निर्वाचित कंजरवेटिव सदस्य एंड्रयू बोवी ने कहा कि एसएनपी को स्पष्ट बहुमत न मिलने के साथ ही आजादी की मांग पर विराम लग गया है। पार्टी के एक दूसरे नव-निर्वाचित सदस्य ने कहा कि चुनाव में कंजरवेटिव पार्टी का एजेंडा एसएनपी को बहुमत से वंचित करना था। इसमें वह सफल रही। इसलिए दूसरे जनमत संग्रह की मांग भोथरी हो गई है।
स्कॉटलैंड में आजादी के सवाल पर पहला जनमत संग्रह 2014 में हुआ था। तब आजादी समर्थकों की मामूली अंतर से हार हो गई थी। लेकिन ब्रेग्जिट के बाद स्कॉटलैंड में माहौल बदल गया है। इसलिए संभावना है कि अगर दूसरा जनमत संग्रह हुआ, तो बहुमत आजादी के पक्ष में मतदान कर सकता है। बहुमत न मिलने के सवाल एसएनपी का कहना है कि स्कॉटलैंड में चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर भी होता है। ये प्रणाली छोटे दलों के लिए फायदेमंद होती है।
इसलिए एसएनपी को पूर्ण बहुमत मिलना पहले से कठिन था। लेकिन ग्रीन पार्टी को मिले समर्थन को देखें, तो जनमत संग्रह चाहने वाले दलों को साझा तौर पर पूरा बहुमत मिला है। विश्लेषकों का कहना है कि स्टरजन जनमत संग्रह के एजेंडे पर अडिग रहेंगी। प्रांतीय असेंबली से वे इसके पक्ष में प्रस्ताव पारित कराएंगी। उसे ज्यादा समय तक नजरअंदाज करना ब्रिटिश सरकार के लिए मुश्किल साबित हो सकता है।