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ईरान युद्ध का दुनिया पर क्या असर?: कहीं तेल बचाने के लिए ऑड-ईवन लागू, कहीं स्कूल-कॉलेज बंद; जानें भारत के कदम

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Mon, 09 Mar 2026 05:05 PM IST

सार

बीते कुछ दिनों में पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से कितना गंभीर ऊर्जा संकट पैदा हुआ है? इस संकट का दुनिया पर कैसा असर पड़ा है? अलग-अलग देश इस संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं? इस्राइल-अमेरिका के ईरान से युद्ध का भारत पर कितना असर दिख रहा है? आइये जानते हैं...
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पश्चिम एशिया में तनाव से दुनियाभर में खड़ा हुआ ऊर्जा संकट। - फोटो : अमर उजाला
अमेरिका-इस्राइल की तरफ से ईरान पर किए गए हमलों और इसके जवाब में तेहरान की तरफ से किए गए पलटवार का असर अब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले रहा है। दरअसल, ईरान पर हमले की वजह से पश्चिम एशिया का बड़ा हिस्सा पहले ही बुरी तरह प्रभावित हुआ था। इसके बाद ईरान की तरफ से क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिसकी चपेट में इन देशों के कई ऊर्जा स्रोत भी आए। इस जले पर नमक ईरान की तरफ से होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने के बाद से पड़ गया, क्योंकि दुनिया की करीब 20 फीसदी ऊर्जा जरूरतें इसी क्षेत्र से पूरी होती हैं। यानी पश्चिम एशिया में जो युद्ध अमेरिका-इस्राइल ने सत्ता परिवर्तन के इरादे से किया था, वह जाने-अनजाने में पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा संकट का कारण बन गया है। 

28 फरवरी को शुरू हुआ यह युद्ध अब अपने 10वें दिन में प्रवेश कर चुका है। हालांकि, इतने छोटे अंतराल में ही इस युद्ध के चलते दुनियाभर के शेयर बाजार धड़ाम हो चुके हैं। तेल-गैस की आपूर्ति अपने निचले स्तर की तरफ बढ़ रही है, जिसके चलते देशों को मजबूरन अपनी ऊर्जा जरूरतों का प्रबंधन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसका सीधा असर इन देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ने का अनुमान है, जो कि आने वाले दिनों में बढ़ती महंगाई के असर से भी जूझती दिख सकती हैं।


ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर बीते कुछ दिनों में पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से कितना गंभीर संकट पैदा हुआ है? इस संकट का दुनिया पर कैसा असर पड़ा है? अलग-अलग देश इस संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं? इस्राइल-अमेरिका के ईरान से युद्ध का भारत पर कितना असर दिख रहा है? आइये जानते हैं...
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पश्चिम एशिया में तनाव से दुनियाभर में खड़ा हुआ ऊर्जा संकट। - फोटो : अमर उजाला
अमेरिका-इस्राइल की तरफ से ईरान पर किए गए हमलों और इसके जवाब में तेहरान की तरफ से किए गए पलटवार का असर अब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले रहा है। दरअसल, ईरान पर हमले की वजह से पश्चिम एशिया का बड़ा हिस्सा पहले ही बुरी तरह प्रभावित हुआ था। इसके बाद ईरान की तरफ से क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिसकी चपेट में इन देशों के कई ऊर्जा स्रोत भी आए। इस जले पर नमक ईरान की तरफ से होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने के बाद से पड़ गया, क्योंकि दुनिया की करीब 20 फीसदी ऊर्जा जरूरतें इसी क्षेत्र से पूरी होती हैं। यानी पश्चिम एशिया में जो युद्ध अमेरिका-इस्राइल ने सत्ता परिवर्तन के इरादे से किया था, वह जाने-अनजाने में पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा संकट का कारण बन गया है। 

28 फरवरी को शुरू हुआ यह युद्ध अब अपने 10वें दिन में प्रवेश कर चुका है। हालांकि, इतने छोटे अंतराल में ही इस युद्ध के चलते दुनियाभर के शेयर बाजार धड़ाम हो चुके हैं। तेल-गैस की आपूर्ति अपने निचले स्तर की तरफ बढ़ रही है, जिसके चलते देशों को मजबूरन अपनी ऊर्जा जरूरतों का प्रबंधन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसका सीधा असर इन देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ने का अनुमान है, जो कि आने वाले दिनों में बढ़ती महंगाई के असर से भी जूझती दिख सकती हैं।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर बीते कुछ दिनों में पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से कितना गंभीर संकट पैदा हुआ है? इस संकट का दुनिया पर कैसा असर पड़ा है? अलग-अलग देश इस संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं? इस्राइल-अमेरिका के ईरान से युद्ध का भारत पर कितना असर दिख रहा है? आइये जानते हैं...

पहले जानें- युद्ध की वजह से कितना गंभीर ऊर्जा संकट?


1. तेल-गैस भंडारों पर हमला, इनका उत्पादन प्रभावित
युद्ध और आपूर्ति में कटौती के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। ब्रेंट क्रूड ऑयल (कच्चे तेल) की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जो 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पहली बार हुआ है। केवल एक हफ्ते के अंदर तेल की कीमतों में 30% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

एक ईरानी ड्रोन हमले के कारण कतर की मुख्य एलएनजी निर्यात सुविधा बंद हो गई है, जिससे वैश्विक गैस आपूर्ति गंभीर रूप से बाधित हुई है। इसके अलावा सऊदी अरब की अरामको, कुवैत की पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और बहरीन की बैपको एनर्जीज में भी रिफाइनरियों पर हुए हमलों के असर को देखते हुए अलग-अलग देशों से किए गए तेल-गैस सप्लाई के अनुबंधों पर फिलहाल रोक लगाते हुए फोर्स मैज्योर का नोटिस दे दिया है। इसके चलते तेल-गैस की निर्बाध सप्लाई जारी रखने वाले स्रोत या तो कम हो गए हैं या फिर इन देशों ने तेल-गैल की आवक घटा दी गई है। नतीजतन दुनिया में तेल की मांग लगातार बनी हुई है, जबकि इसकी सप्लाई कम है। ऐसे में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है।

2. होर्मुज जलडमरूमध्य बंद, ऊर्जा सप्लाई में भी बड़ी रुकावट
ईरान की तरफ से जहाजों को आग लगाने की धमकी के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से यातायात लगभग पूरी तरह से रुक गया है और 200 से ज्यादा टैंकर इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं। यह दुनिया का एक अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से वैश्विक तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का लगभग 20% हिस्सा गुजरता है। इस मार्ग के बंद होने का सबसे बड़ा असर यह है कि जिन देशों ने तेल-गैस की सप्लाई जारी भी रखी है, उनके टैंकर भी मार्ग में ही फंस गए हैं और यूरोप और एशियाई देशों के लिए यह बड़ी समस्या बन रहा है। इसके बंद होने से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इराक और कुवैत जैसे विशाल उत्पादकों को 14 करोड़ बैरल तेल का शिपमेंट रोकना पड़ा है।

2025 में एशियाई देशों ने इसी मार्ग से अपना 87% कच्चा तेल और 86% एलएनजी आयात किया था। अब इस मार्ग के बंद होने से एशिया से लेकर यूरोप तक में ईंधन खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है। अधिकतर देश इस स्थिति से निपटने के लिए पश्चिम एशियाई क्षेत्र से दूर रूस, ब्राजील, कनाडा, अमेरिका और अन्य देशों से तेल आयात कराने पर विचार कर रहे हैं। 

3. हमलों से जलमार्ग से यातायात प्रभावित, माल ढुलाई-बीमा की कीमतें बढ़ीं
जहाजों के फंसे होने और ईंधन की कीमतों में तेजी के कारण जलमार्गों पर माल ढुलाई की दरें आसमान छू रही हैं। पश्चिम एशिया से चीन तक तेल ले जाने वाले सुपरटैंकर का किराया लगभग दोगुना होकर 400,000 डॉलर प्रतिदिन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है। वहीं, अटलांटिक बेसिन से एशिया तक एलएनजी गैस ले जाने वाले जहाजों का किराया छह गुना बढ़कर 264,000 डॉलर प्रतिदिन हो गया है। अमेरिका की खाड़ी से चीन तक कच्चा तेल ले जाने की लागत भी लगभग दोगुनी हो गई है। 

इसके अलावा समुद्री हमलों के उच्च जोखिम को देखते हुए बीमा कंपनियों ने जहाजों के प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी कर दी है। खास तौर से उन जहाजों का बीमा बहुत महंगा हो गया है जिन्हें अमेरिकी, ब्रिटिश या इस्राइली मूल का माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह जहाज ईरानी, हिजबुल्ला और हूती विद्रोहियों के हमले की जद में सबसे ज्यादा हैं। यह कीमतें सीधे तौर पर देशों के ऊर्जा बिल में जुड़ती हैं, जिससे तेल-गैस महंगा होने का जोखिम ज्यादा होता है। 

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दुनिया पर इस संकट का कितना असर?

ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट से निपटने के लिए अलग-अलग देश कई कड़े कदम उठा रहे हैं। जहां भारत ने हाल ही में तेल की खरीद के लिए रूस का रुख किया  और एलपीजी गैस की कीमतें बढ़ाने के साथ सिलेंडर मंगाने से जुड़े नियम बदले हैं तो वहीं म्यांमार और बांग्लादेश ने भी महंगे होते तेल की समस्या से निपटने के लिए भी कुछ अहम कदम उठाए हैं।

एशिया पर सबसे ज्यादा प्रभाव

1. चीन 
चीन के पास 1.3 अरब बैरल का विशाल तेल भंडार है, लेकिन उसने घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए अपनी रिफाइनरियों को डीजल और पेट्रोल के निर्यात को रोकने का आदेश दिया है। मजेदार बात यह है कि चीन के तेल भंडार में हर वक्त करीब एक साल तक इस्तेमाल लायक कच्चा तेल मौजूद रहता है। 

2. पाकिस्तान 
पाकिस्तान में ईंधन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की गई है और एक नई साप्ताहिक मूल्य निर्धारण प्रणाली शुरू की जा रही है। सरकार ईंधन बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन क्लासेज लागू करने पर विचार कर रही है। इसके अलावा पाकिस्तान ने लाल सागर के रास्ते वैकल्पिक तेल आपूर्ति के लिए सऊदी अरब से औपचारिक मदद मांगी है।

3. बांग्लादेश 
घबराहट में हो रही खरीदारी को रोकने के लिए बांग्लादेश ने ईंधन की बिक्री पर कुछ प्रतिबंध लगा दिए हैं। कतर की ओर से एलएनजी आपूर्ति रोकने के कारण वहां भारी संकट है। बिजली और ईंधन बचाने के लिए विश्वविद्यालयों को भी बंद कर दिया गया है और ईद की अग्रिम छुट्टियां घोषित की गई हैं।

4. जापान और दक्षिण कोरिया 
जापान के पास 354 दिनों का विशाल रिजर्व है। इसके बावजूद यहां सरकार ने अपने राष्ट्रीय तेल भंडार से कच्चा तेल निकालने की तैयारी शुरू कर दी है। दक्षिण कोरिया ने ऊर्जा संकट को देखते हुए लगभग 30 साल में पहली बार घरेलू ईंधन की कीमतों पर कैप यानी ऊपरी सीमा का एलान कर दिया है। 

5. वियतनाम और थाईलैंड
वियतनाम ने ईंधन से आयात शुल्क हटा दिया है और कच्चे तेल के निर्यात को पूरी तरह रोक दिया है। थाईलैंड ने भी अपने ईंधन के निर्यात को निलंबित कर दिया है।

6. श्रीलंका और नेपाल
इन दोनों देशों में लोग ऊर्जा की कमी की आशंका के कारण पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइनों में लग कर खरीदारी कर रहे हैं। श्रीलंका सरकार ने घबराहट में की जा रही इस खरीदारी को लेकर सलाह भी जारी की है। 

7. म्यांमार
पश्चिम एशिया में जारी संकट के चलते म्यांमार तक पहुंचने वाले टैंकरों की आवाजाही रुक गई है, जिससे देश में भारी किल्लत पैदा हो गई है। आलम यह है कि म्यांमार के सीमावर्ती शहर मयावाडी  में 3 मार्च की शाम तक ही ईंधन पूरी तरह से खत्म हो गया था, जिससे पेट्रोल पंपों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा और लोग थाईलैंड में जाकर तेल खरीदने के लिए मजबूर हुए। इस स्थिति से निपटने के लिए म्यांमार के शासकों ने ईवन-ऑड राशनिंग सिस्टम लागू किया है। इसके तहत सम संख्या से जिन गाड़ियों का नंबर खत्म होता है, वह एक दिन और विषम संख्या वाली गाड़िया अगले दिन चलेंगी। हालांकि, इलेक्ट्रिक वाहनों को इससे छूट दी गई है। 

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पश्चिमी देशों में चिंता

1. अमेरिका 
अमेरिका में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जो उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा मुद्दा बन गया है। इसके चलते अमेरिका में महंगाई दर बढ़ने के भी आसार हैं, जो कि ट्रंप के लिए इसी साल के अंत में होने वाले मध्यावधि चुनाव में बड़ी परेशानी बन सकती है। अमेरिका और अपने मित्र देशों के खातिर स्थिति को संभालने के लिए ट्रंप ने तेल टैंकरों को अमेरिकी नौसैनिक एस्कॉर्ट (सुरक्षा) देने की पेशकश की है।

2. यूरोप और ब्रिटेन
यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगभग 64% से 67% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ब्रिटेन में गैस की कीमतें एक ही हफ्ते से कम समय में लगभग दोगुनी हो गई हैं। यूरोप को अब अपनी जरूरत पूरी करने के लिए गैस (एलएनजी) के 180 अतिरिक्त कार्गो खरीदने की आवश्यकता पड़ रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि उसे इस सप्लाई के लिए रूस पर निर्भर होना पड़ सकता है, जिससे यूरोप पहले ही यूक्रेन युद्ध की वजह से निर्भरता घटाने पर जोर दे रहा था। यानी अमेरिका का ईरान के खिलाफ युद्ध रूस के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। 

3. पश्चिम एशिया के उत्पादक देश
निर्यात मार्ग बंद होने और तेल भंडारण क्षमता के फुल हो जाने की वजह से उत्पादक देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इराक ने अपने मुख्य तेल क्षेत्रों में उत्पादन में 70% की भारी कटौती की है और कुवैत ने भी उत्पादन घटा दिया है। हालांकि, इसका असर सीधे इन देशों को मिलने वाली रकम पर पड़ेगा, क्योंकि इनकी आय का मुख्य स्रोत ही तेल-गैस की बिक्री है। अगर यह संघर्ष लंबा चला तो पश्चिम एशिया के देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

इस्राइल-अमेरिका के ईरान से युद्ध का भारत पर कितना असर?

इस्राइल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का भारत पर भी जबरदस्त असर दिख रहा है। हालांकि, भारत ने अपनी कूटनीति और रणनीतिक भंडार के बल पर कच्चे तेल के मोर्चे पर स्थिति को काफी हद तक संभाल लिया है।

कच्चे तेल की आपूर्ति और रणनीतिक विविधता से स्थिति संभली

  • भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 90% तेल आयात करता है, जिसमें से लगभग 40% (2.5 से 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन) तेल इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे देशों से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। 
  • होर्मुज मार्ग के बाधित होने के बावजूद, भारत का 60% कच्चा तेल अब रूस, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और मध्य एशिया जैसे सुरक्षित रास्तों से आ रहा है। 
  • पिछले एक दशक में भारत ने अपने तेल आपूर्तिकर्ताओं का दायरा 27 से बढ़ाकर 40 देशों तक कर लिया है, ताकि किसी एक मार्ग के बंद होने से आपूर्ति का आपातकाल न पैदा हो।

एलपीजी और एलएनजी संकट अब भी चिंता की वजह

  • भारत के लिए इस समय कच्चे तेल से ज्यादा चिंता का विषय गैस की आपूर्ति है, क्योंकि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है और यह पूरी आपूर्ति खाड़ी देशों से होर्मुज मार्ग के जरिए ही होती है। दूसरी ओर भारत के कुल एलएनजी आयात का आधे से अधिक हिस्सा भी इसी क्षेत्र से आता है। 
  • इसके चलते भारत में एलपीजी की कीमतों में 60 से 115 रुपये और एलएनजी की कीमतों में लगभग 80 रुपये का इजाफा हुआ है। गैस संकट को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने भारत को अतिरिक्त गैस आपूर्ति की पेशकश की है।

सरकार के आपातकालीन कदम

  • कुकिंग गैस की कमी से बचने के लिए भारत सरकार ने आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम (ESMA) लागू कर दिया है। 
  • सरकार ने सभी तेल रिफाइनरियों को निर्देश दिया है कि वे एलपीजी के उत्पादन को अधिकतम करें और इसे प्राथमिकता दें।

रिफाइनरियों के संचालन पर असर
आपूर्ति की कमी के कारण भारतीय रिफाइनरियों को अपना उत्पादन घटाना पड़ रहा है। मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स (एमआरपीएल), जो भारत की कुल रिफाइनिंग क्षमता का 6% हिस्सा है, ने अपनी तीन में से एक यूनिट बंद कर दी है। एमआरपीएल ने विदेशी खरीदारों को पेट्रोल निर्यात करने में असमर्थता जताते हुए फोर्स मेज्योरकी घोषणा कर दी है।

पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर, पर जनता में घबराहट
अमेरिका और पाकिस्तान जैसे देशों की तुलना में भारत में ईंधन के दाम स्थिर हैं। भारत के पास वर्तमान में लगभग आठ सप्ताह (10 करोड़ बैरल) का सुरक्षित इन्वेंट्री भंडार है, जिसमें 25 दिन का भंडार शामिल है। इसके बावजूद, कीमतों में बढ़ोतरी के डर से पूरे देश में पेट्रोल पंपों के बाहर लोगों की लंबी कतारें देखी गई हैं।

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