Benjamin Netanyahu and Prince Mohammed Al Nahyan
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इस्राइल और यूएई के बीच हुए शांति समझौते का भारत ने समर्थन किया है। हालांकि, भारत ने इस्राइल और फलस्तीन के बीच जारी विवाद का हल निकलने की उम्मीद जाहिर करते हुए फलस्तीन को अपना समर्थन जारी रखने की घोषणा की है। इस्राइल से शांति समझौते के बाद शुक्रवार को यूएई के विदेश मंत्री ने विदेश मंत्री एस जयशंकर से फोन पर बातचीत कर जानकारी साझा की।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई बातचीत की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा शांति बहाली का पक्षधर है। ऐसे में वह इस्राइल और यूएई के बीच हुए समझौते का स्वागत करता है। जहां तक फलस्तीन का सवाल है तो इस मुद्दे पर भारत उसे अपना परंपरागत समर्थन जारी रखेगा।
ईरान-चीन की नजदीकी बनी समझौते की वजह
इस्राइल और यूएई के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते का कारण चीन की रणनीति बनी है। दरअसल एशिया और खासतौर पर अरब देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों में जुटे चीन ने हाल ही में यूएई के प्रतिद्वंद्वी ईरान से कई अहम समझौते किए।
इसके अलावा चीन ने इस्लामिक देशों में यूएई का प्रभुत्व कम करने के लिए पाकिस्तान, मलेशिया और तुर्की जैसे देशों को साधा। इसके जवाब में यूएई ने इस्राइल से ऐतिहासिक समझौता कर इस्लामिक देशों के समीकरणों में बड़े बदलाव का संकेत दिया।
भारत की स्थिति बेहतर
चीन की रणनीति के कारण भारत को ईरान से दूरी के रूप में कूटनीतिक घाटा उठाना पड़ा। मगर इसी कारण भारत को यूएई से नजदीकी का कूटनीतिक लाभ हासिल हुआ। अब स्थिति यह है कि इस्लामिक देश दो गुटों में बंट गया है। एक तरफ चीन की रणनीति के अनुसार आगे बढ़ रहा पाकिस्तान, मलेशिया, तुर्की और ईरान है तो दूसरी ओर यूएई के नेतृत्व में शामिल अन्य इस्लामिक देश। भारत ने इस मामले में दोहरी रणनीति अपनाई है।
एक तरफ भारत ने यूएई और इस्राइल के बीच हुए समझौते का समर्थन किया है तो दूसरी ओर फलस्तीन को अपना समर्थन जारी रखने की घोषणा की है। भारत की कोशिश इसके जरिए इस्राइल विरोधी इस्लामिक देशों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की भी है।