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बगदादी की मौत का जश्न मना रहा है आतंकी पाकिस्तान, अफगानिस्तान पर मन मांगी मुराद हुई पूरी!

Wed, 30 Oct 2019 06:01 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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Imran Khan with US special envoy Zalmay Khalilzad - फोटो : thenational
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इस साल अक्टूबर के पहले हफ्ते में अफगानिस्तान में अमेरिकी शांति वार्ताकार जिल्मे खलीलजाद और तालिबानी नेताओं की मुलाकात में पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई थी। वहीं खलीलजाद एक बार फिर पाकिस्तान की यात्रा पर पहंचे, जहां उन्होंने इमरान खान से मुलाकात की। खलीलजाद के पहले पाकिस्तान दौरे के दौरान इमरान की उनसे कोई आधिकारिक वार्ता नहीं हुई थी। वहीं आईएसआईएस सरगना बगदादी के मौत के बाद इस मुलाकात को बेहद अहम माना जा रहा है।

अमेरिका के लिए राहत

पिछले हफ्ते अमेरिका ने सीरिया में इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) के नेता अबु बकर अल-बगदादी के गुप्त ठिकाने पर हमला करके उसे ढेर कर दिया। वहीं बगदादी के खात्मे से अमेरिका ने राहत की सांस ली है, तो भारत की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। बगदादी का खात्मा न केवल इराक और सीरिया के लिये राहतभरा है, लेकिन अफगानिस्तान के लिये खतरे की घंटी है। क्योंकि पिछले कुछ समय से अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट खुरासान अपनी पकड़ बना रहा था। लेकिन बगदादी के मरने से तालिबान को फिर से अपनी पकड़ बनाने का मौका मिलेगा।

आईएस में जा रहे थे तालिबानी लड़ाके

उत्तरी अफगानिस्तान इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया- खुरासान का नया अड्डा बना था। तालिबान के कमजोर होने का फायदा इस्लामिक स्टेट को मिल रहा था, इस्लामिक स्टेट की तंजीमों से प्रभावित होकर तालिबान के कई लड़ाके आईएस-के में शामिंल हो रहे थे, जिससे तालिबान को ही चुनौती मिल रही थी। माना जाता है कि तालिबान के साथ चल रही शांति वार्ता को तोड़ने में आईएस-के की अहम भूमिका रही है।

तालिबान की कमान पाक के हाथ

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप चुनावों से पहले अफगान से अपनी सेना की वापसी चाहते हैं। ट्रंप तुर्की के हाथ में कमान देकर सीरिया से इसकी शुरुआत भी कर चुके हैं। लेकिन अफगानिस्तान को लेकर ट्रंप भ्रम की स्थिति में थे। क्योंकि पाकिस्तान, चीन, रूस चाहते थे कि किसी भी तरह से अमेरिकी सेनाओं की अफगानिस्तान से वापसी हो, वहीं भारत और मौजूदा अफगान सरकार इसके पक्ष में नहीं थी। भारत को डर है कि तालिबान की कमान पाकिस्तान के हाथ में है और अगर शांति वार्ता आगे बढ़ती है, तो ईरान में भारत की मदद से बन रहे चाबहार पोर्ट के साथ अफगानिस्तान में चल रहे कई भारतीय प्रोजेकट्स को खतरा पैदा हो सकता है।

नाराज है अफगान सरकार

यहां तक पाकिस्तान में तालिबान और खलीलजाद की बैठक पर अफगान सरकार पहले ही सवाल उठा चुकी है। अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर तालिबानी नेताओं की मेजबानी करने का आरोप लगाया था। अफगानिस्तान का आरोप था कि किसी विद्रोही समूह की मेजबानी करना नियमों और सिद्धांतों के खिलाफ है। वहीं तालिबानियों को रिहा करने के इस फैसले में मौजूदा अफगान सरकार से कोई सलाह-मशविरा तक नहीं किया गया।     

पाक-चीन की मुराद हुई पूरी

दूसरी तरफ, अफगान सरकार शांति वार्ता में खुद को किनारे किए जाने से नाराज है। वहीं सीपीईसी प्रोजेक्ट को लेकर चीन और पाकिस्तान के हित सबके सामने हैं। किसी को भी अमेरिका की मौजूदगी रास नहीं नहीं आ रही है। बगदादी के मरने से पाकिस्तान और चीन की तो मनमांगी मुराद पूरी हो गई है और पाकिस्तान की पूरी कोशिश है कि अब ये बेहतरीन मौका है और तालिबान के साथ अमेरिका की शांति वार्ता को फिर से पटरी पर लाया जा सकता है।

अफगान पर अगली बैठक बीजिंग में

अमेरिकी शांति वार्ताकार जिल्मे खलीलजाद का यह एक महीने में ही दूसरा पाकिस्तानी दौरा है। दो दिवसीय दौरे पर पाकिस्तान आए खलीलजाद ने प्रधानमंत्री इमरान खान, सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों से भी मुलाकात की। खलीलजाद इससे पहले अफगान दौरे पर भी गए थे, जहां उन्होंने वहां के नेताओं से मुलाकात करके शांति वार्ता के नए प्रयासों के बारे में जानकारी दी। इससे पहले 25 अक्टूबर को मास्को में पाकिस्तान, चीन, रूस और अमेरिका के विशेष प्रतिनिधियों ने दूसरी बार अफगान शांति प्रक्रिया को लेकर विचार-विमर्श किया था। बैठक में फैसला हुआ कि वहीं बीजिंग में अफगानिस्तान को लेकर अगली बैठक होगी, जहां अफगान नेताओं के अलावा, विशेष प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में तालिबानी नेता हिस्सा लेंगे।

तालिबान ने रिहा कराया अफीम किंग

इससे पहले पाकिस्तान की सरपरस्ती में जिल्मे खलीलजाद और तालिबान नेताओं के बीच हुई बैठक में तीन भारतीय इंजीनियरों को रिहा करने के बदले 11 तालिबानी कमांडर्स को छोड़े जाने पर सहमति बनी थी। इन 11 तालिबानियों में अब्दुल रहमान और मौलवी अब्दुल राशिद बलूच की रिहाई चौंकाने वाली थी। क्योंकि मौलवी अब्दुल राशिद बलूच का नाम प्रतिबंधित अंतरराष्ट्रीय आतकिंयों की सूची में शामिल है। अब्दुल रहमान और राशिद बलूच, दोनों तालिबान शासन के दौरान कुनार और निम्रोज प्रांत के गवर्नर थे और इन्हें अमेरिकी सेना ने बरगम एयरबेस से रिहा किया। इनमें से राशिद बलूच को अफीम किंग के नाम से जाना जाता है और इसे टनों अफीम के शिपमेंट के साथ रंगे हाथों पकड़ा गया था। अदालत ने उसे 18 साल की सजा सुनाई थी।

बलूच का भारत में आतंकी कनेक्शन

वहीं बलूच को छोड़े जाने को लेकर कई सवाल उठ खड़े हुए थे, क्योंकि तमाम ऐसे सबूत मौजद हैं कि जिसमें बलूच के आतंकी हमलों में शामिल होने का गठजोड़ सामने आया था। वहीं बलूच के पकड़े जाने के बाद तालिबान को मिलने वाले टेरर फंडिग में भी कमी आई थी और तालिबान की कमर टूटी थी। वहीं बलूच का रिहा होने से ड्रग ट्रैफिकिंग के जरिए टेरर फंडिग में बढ़ोतरी होगी। साथ ही, भारत में हुए तमाम आतंकी हमलों में अफीम की खेती से मिले पैसों का इस्तेमाल की सूचनाएं सामने आई थीं। दिसंबर 2015 में पठानकोट एयरबेस और 26/11 मुंबई आतंकी हमलों में अफगान ड्रग ट्रैफिकिंग का कनेक्शन सामने आया था।

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