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US: क्या ईरान युद्ध में फंसकर घरेलू मोर्चे पर घिर गए हैं ट्रंप? कमजोर जनसमर्थन और बढ़ती महंगाई बनी बड़ी चुनौती

Mon, 16 Mar 2026 10:40 AM IST
Riya Dubey वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ईरान युद्ध को लेकर डोनाल्ड ट्रंप घरेलू दबाव में हैं, क्योंकि इस सैन्य कार्रवाई को अमेरिकी जनता का मजबूत समर्थन नहीं मिला है। युद्ध के उद्देश्य, इजरायल से जुड़ी धारणा और तेल कीमतों में उथल-पुथल ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो ट्रंप के लिए यह बड़ा राजनीतिक संकट बन सकता है।

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अमेरिकी राष्ट्रपति पर सियासी संकट? - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ युद्ध को लेकर ऐसे समय में घिरे हुए नजर आ रहे हैं, जब इस सैन्य कार्रवाई को अमेरिकी जनता का व्यापक समर्थन नहीं मिला है। विश्लेषकों का मानना है कि हाल के इतिहास में शायद ही कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इतने कम सार्वजनिक समर्थन के साथ किसी बड़े युद्ध में उतरा हो। उपलब्ध सर्वेक्षणों में कहीं भी ऐसा संकेत नहीं मिलता कि ईरान के खिलाफ युद्ध को लेकर अमेरिकी जनता का बहुमत ट्रंप के साथ खड़ा है। इसके उलट, कई जनमत सर्वेक्षणों में साफ तौर पर इस युद्ध के खिलाफ राय सामने आई है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आम तौर पर युद्ध जैसे-जैसे लंबा खिंचता है, जनता का समर्थन और घटता जाता है, जिससे ट्रंप के सामने आगे और बड़ी राजनीतिक मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

ट्रंप ने जनता के सामने कोई स्पष्ट और ठोस मामला पेश नहीं किया

रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिकी जनता के सामने कोई स्पष्ट और ठोस सार्वजनिक मामला पेश नहीं किया। उन्होंने फारस की खाड़ी में सैन्य जमावड़े को ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दबाव बनाने और बातचीत के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रणनीति के रूप में पेश किया था। लेकिन बहुत कम समय में यह कूटनीतिक दबाव सीधे सैन्य कार्रवाई में बदल गया। कहा जा रहा है कि ट्रंप तेज, चौंकाने वाले और नाटकीय अंदाज में सैन्य कार्रवाई को अंजाम देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने युद्ध से पहले व्यापक जनसमर्थन जुटाने की कोशिश नहीं की।

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यह भी माना जा रहा है कि ट्रंप को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाने की अपनी रणनीतिक सफलता से भी हौसला मिला। हालांकि वह कदम भी अमेरिकी जनता के बीच बहुत लोकप्रिय नहीं था। इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन ने ईरान के मामले में सार्वजनिक राय की अनदेखी की और अब उसी का राजनीतिक असर उन्हें झेलना पड़ रहा है।

किसी युद्ध के समर्थन का सवाल किन बातों पर निर्भर करता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी युद्ध के समर्थन का सवाल केवल इस पर निर्भर नहीं करता कि लड़ाई कैसे चल रही है, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि जनता उस युद्ध का उद्देश्य क्या समझती है। राजनीतिक वैज्ञानिक ब्रूस जेंटलसन का तर्क है कि अमेरिकी जनता उन युद्धों का ज्यादा समर्थन करती है, जिनका उद्देश्य किसी आक्रामक शक्ति पर लगाम लगाना हो। इसके विपरीत, जब युद्ध का मकसद किसी दूसरे देश की राजनीतिक व्यवस्था बदलना या सत्ता परिवर्तन करना होता है, तो समर्थन काफी कमजोर पड़ जाता है।

ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप का उद्देश्य क्या नजर आ रहा?

इसी संदर्भ में विश्लेषक ईरान युद्ध को भी देखते हैं। उनका कहना है कि इस युद्ध का वास्तविक उद्देश्य रेजीम चेंज यानी ईरान में सत्ता परिवर्तन ही नजर आता है। ट्रंप पिछले कई महीनों से इस बारे में लगातार बोलते रहे हैं और अब भी उनकी बयानबाजी इसी दिशा की ओर इशारा करती है। यही वजह है कि प्रशासन की ओर से युद्ध को आत्मरक्षा या तात्कालिक सुरक्षा के कदम के रूप में पेश करने की कोशिश अमेरिकी जनता को बहुत भरोसेमंद नहीं लगी।

ट्रंप प्रशासन ने ईरान हमले को सही ठहराने के लिए क्या-क्या तर्क दिए ?

बमबारी शुरू होने के बाद ही ट्रंप और उनके सहयोगियों ने यह तर्क देना शुरू किया कि ईरान अमेरिका के लिए तत्काल खतरा था। लेकिन आलोचकों के मुताबिक यह दलील कई वजहों से कमजोर पड़ी। एक ओर ट्रंप हाल तक यह दावा करते रहे थे कि उन्होंने पहले ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह तबाह कर दिया है, वहीं दूसरी ओर युद्ध शुरू होने के बाद अचानक ईरान को गंभीर और तत्काल खतरे के रूप में पेश किया जाने लगा।

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हमलों के तुरंत बाद जारी एक वीडियो संदेश में ट्रंप ने 1979 के तेहरान बंधक संकट, 1983 में बेरूत में अमेरिकी मरीन पर हुए हमले और 2000 में यूएसएस कोल पर हुए बम हमले का जिक्र किया। उन्होंने यहां तक कहा कि यूएसएस कोल हमले में ईरान की शायद भूमिका थी। हालांकि आलोचकों का कहना है कि पुराने घटनाक्रमों को जोड़कर मौजूदा युद्ध के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश बहुत प्रभावी नहीं रही।

ट्रंप प्रशासन की ओर से युद्ध को सही ठहराने की सबसे जटिल दलील विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दी। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने पूर्व-खतरों के खिलाफ आत्मरक्षा के तहत कार्रवाई की, क्योंकि उसे पता था कि इस्राइल ईरान पर हमला करने वाला है और उसके जवाब में ईरान पश्चिम एशिया में अमेरिकी हितों और नागरिकों को निशाना बना सकता है। लेकिन यह तर्क भी अमेरिकी जनता के बीच बहुत असरदार नहीं रहा।


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इस्राइल को लेकर क्या है जनता की राय?

इस बीच, अमेरिका में इस्राइल को लेकर भी जनमत बदलता दिख रहा है। हालिया सर्वेक्षणों में पहली बार इस सदी में ऐसे संकेत मिले कि अधिक अमेरिकी अपनी सहानुभूति फिलिस्तीनियों के साथ जता रहे हैं। ऐसे माहौल में ईरान युद्ध को इस्राइल की लड़ाई बताने वाली आवाजें भी तेज हुई हैं। दक्षिणपंथी कमेंटेटर टकर कार्लसन और कई प्रभावशाली रूढ़िवादी चेहरों ने भी इस युद्ध पर सवाल उठाए हैं।

रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की आक्रामक बयानबाजी ने भी विवाद बढ़ाया है। नागरिक ठिकानों पर हमलों और सैन्य कार्रवाई के मानवीय असर को लेकर उठ रहे सवालों के बीच उनकी टिप्पणियों की आलोचना हो रही है। इससे प्रशासन पर घरेलू दबाव और बढ़ा है।

अमेरिका युद्ध की आर्थिक कीमत के तैयार नहीं

विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप अभी अपने मुख्य समर्थक वर्ग को साथ रखने में सफल दिख रहे हैं, लेकिन उन्होंने देश को युद्ध की आर्थिक कीमत के लिए तैयार नहीं किया। ईरान संघर्ष के कारण वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल देखी जा रही है, जिसका असर ईंधन, यात्रा और खाद्य कीमतों तक पर पड़ सकता है। महंगाई से जूझ रहे अमेरिकी मतदाताओं के लिए यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप की सबसे बड़ी चुनौती अब सिर्फ युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू राजनीति भी उतनी ही अहम हो गई है। कांग्रेस में भले ही रिपब्लिकन पार्टी के नेता खुलकर विरोध नहीं कर रहे हों, लेकिन मध्यावधि चुनावों के करीब आते ही पार्टी के भीतर बेचैनी बढ़ सकती है। माना जा रहा है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है और आर्थिक दबाव बढ़ता है, तो ट्रंप पर इसे जल्द खत्म करने का दबाव और तेज हो सकता है।


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