इस्लाम की बात करने वाले संगठन, यहां तक कि जिहादी सलफी समूह (अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन) के उदय का गहरा और सीधा संबंध इस्लामी खिलाफत के मुद्दे से है। ये और इस तरह के दूसरे कई संगठन इस्लामी खिलाफत, यानी तुर्की के उस्मानी साम्राज्य के पतन को एक बहुत बड़ी त्रासदी के रूप में देखते हैं। उन्हें लगता है कि इस घटना के बाद मुस्लिम समाज पूरी दुनिया में निर्बल और बदहाल हो गया।
इसी कारण इन तमाम संगठनों ने
इस्लामी खिलाफत की पुनर्स्थापना को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया है। उनका मानना है कि खिलाफत की स्थापना के साथ मुसलमान अपने खोए हुए सुनहरे दिन फिर से हासिल कर लेंगे। इन संगठनों में अफगानिस्तान में उभर रहा इख्वानुल मुसलेमीन सब से अधिक सक्रिय और अहम है क्योंकि इस तरह के दूसरे संगठन जैसे हिजबुत तहरीर और सलफी आंदोलन इख्वानुल मुसलेमीन को ही अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं।
साठ के दशक में
19वीं सदी के 60 के दशक में सैय्यद कुतुब शहीद के धार्मिक लेखों के प्रचार प्रसार के साथ साथ इख्वान के अंदर कुछ ऐसे समूहों का उदय हुआ जो बाद में सैय्य कुतुब की विचारधारा के अनुयायी हो गए। सैय्यद कुतुब को ही ये लोग अपना आदर्श मानने लगे। उस दौर में ऐसे गुटों का विस्तार भी काफी हुआ। ये लोग सैय्यद कुतुब की विचारधार के अनुसार तत्कालीन इस्लामी समाज को अज्ञानी, पथभ्रष्ट मानते थे और उनका कहना था कि दोबारा मूल इस्लाम की ओर लौटना पड़ेगा जिसके लिए इस्लामी खिलाफत की पुनर्स्थापना ही एक मात्र रास्ता है।
जब मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने सैय्यद कुतुब और कई दूसरे लोगों की एक साथ हत्या कर दी तो इख्वान के अंदर उनकी अतिवादी
विचारधारा के मानने वाले बढ़ गए और इख्वान के अंदर ही मध्यम मार्ग वाले विचार के लोग कमजोर पड़ गए। इसी तरह अल-कायदा और खुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले संगठन भी सैय्यद कुतुब के विचार से बहुत प्रभावित हैं। इस तमाम बहस के बाद अब सवाल ये पैदा होता है कि क्या समकालीन हालात में इस्लामी खिलाफत (जिसे कभी-कभी इस्लामी हुकूमत भी कहते हैं) की फिर से स्थापना संभव है?
'इस्लामी खिलाफत' का आकर्षण
हकीकत तो ये है कि इस्लामी खिलाफत का सपना बहुत ही मीठा और आकर्षण भरा है। अभी तक इस सपने ने बहुत से मुसलमान नौजवानों को अपनी ओर आकर्षित भी किया है। इस्लामवादी तत्व इस नतीजे पर पहूंच गए लगते हैं कि अगर इस्लामी खिलाफत का झंडा लेकर आगे बढ़ें तो लोगों को अपने साथ ला सकेंगे और समाज में प्रभाव भी फैला सकेंगे।
इस्लामवादी विचारक अपने इस विचार का खूब प्रचार प्रसार कर रहे हैं कि 'खिलाफत' मूल इस्लाम है और इसका विरोध करने वाले इस्लाम से दगा करने वाले हैं और इस्लाम के दुश्मन हैं। साथ ही ये इस्लामवादी विचारक ये भी कहते हैं कि इस्लाम का 'स्वर्ण युग' और उसका दबदबा खिलाफत के कारण ही था और आज के मुसलमानों का पिछड़ापन खिलाफत नहीं रहने के कारण ही है।
'इस्लामी एकता'
इन विचारकों का ये भी मत है कि इस्लामी खिलाफत से पहले इस्लामी एकता हासिल करना जरूरी है। वे मानते हैं कि इस्लामी दुनिया की भौगोलिक और सांस्कृतिक भिन्नता में एकता ही इस्लाम की शक्ति है और इसी पर इस्लामी साम्राज्य की मजबूती है। इस्लामी खिलाफत के पक्षधर ये भी मानते हैं कि खिलाफत ही के कारण मुसलमानों ने क्रूसेड्स (10 से 12वीं सदी में मुसलमानों और इसाइयों के बीच हुई लड़ाई) में पश्चिम की शक्ति को पराजित किया था और खोए हुए अपने भू-भाग को दोबारा हासिल किया था और अगर अब भी चाहें तो इस्लामी खिलाफत की दोबारा बहाली कर के पश्चिम के वर्चस्व से बाहर आ सकते हैं। लेकिन 'इस्लामी खिलाफत' के सपने का साकार होना संभव नहीं है।
आधुनिक राष्ट्र-राज्य
आज की वास्तविक परिस्थिति से ये जाहिर है कि इस्लामी खिलाफत की दोबारा बहाली संभव नहीं है और जो लोग इस कोशिश में लगे हैं, वे हवा में सोचते हैं। आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के साथ, राज्य की स्थापना के मापदंड में भी बदलाव आया है। इसमें सबसे अहम है कि राज्य के पास एक निश्चित भू-भाग हो लेकिन वहीं धर्म बहुत कम महत्व का रह गया है। समकालीन समाज का ताना बाना पुराने जमाने के समाज की रूपरेखा से पूरी तरह से अलग है। इसलिए जो इस ख्याल में रहते हैं कि इस्लामी साम्राज्य की दोबारा स्थापना होगी वो अतीत में जी रहे हैं।