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क्या 'इस्लामी खिलाफत' का सपना हकीकत में मुमकिन है

Thu, 04 Oct 2018 12:50 PM IST
बीबीसी, हिंदी
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इस्लाम की बात करने वाले संगठन, यहां तक कि जिहादी सलफी समूह (अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन) के उदय का गहरा और सीधा संबंध इस्लामी खिलाफत के मुद्दे से है। ये और इस तरह के दूसरे कई संगठन इस्लामी खिलाफत, यानी तुर्की के उस्मानी साम्राज्य के पतन को एक बहुत बड़ी त्रासदी के रूप में देखते हैं। उन्हें लगता है कि इस घटना के बाद मुस्लिम समाज पूरी दुनिया में निर्बल और बदहाल हो गया।

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इसी कारण इन तमाम संगठनों ने इस्लामी खिलाफत की पुनर्स्थापना को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया है। उनका मानना है कि खिलाफत की स्थापना के साथ मुसलमान अपने खोए हुए सुनहरे दिन फिर से हासिल कर लेंगे। इन संगठनों में अफगानिस्तान में उभर रहा इख्वानुल मुसलेमीन सब से अधिक सक्रिय और अहम है क्योंकि इस तरह के दूसरे संगठन जैसे हिजबुत तहरीर और सलफी आंदोलन इख्वानुल मुसलेमीन को ही अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं।

साठ के दशक में

19वीं सदी के 60 के दशक में सैय्यद कुतुब शहीद के धार्मिक लेखों के प्रचार प्रसार के साथ साथ इख्वान के अंदर कुछ ऐसे समूहों का उदय हुआ जो बाद में सैय्य कुतुब की विचारधारा के अनुयायी हो गए। सैय्यद कुतुब को ही ये लोग अपना आदर्श मानने लगे। उस दौर में ऐसे गुटों का विस्तार भी काफी हुआ। ये लोग सैय्यद कुतुब की विचारधार के अनुसार तत्कालीन इस्लामी समाज को अज्ञानी, पथभ्रष्ट मानते थे और उनका कहना था कि दोबारा मूल इस्लाम की ओर लौटना पड़ेगा जिसके लिए इस्लामी खिलाफत की पुनर्स्थापना ही एक मात्र रास्ता है।
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जब मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने सैय्यद कुतुब और कई दूसरे लोगों की एक साथ हत्या कर दी तो इख्वान के अंदर उनकी अतिवादी विचारधारा के मानने वाले बढ़ गए और इख्वान के अंदर ही मध्यम मार्ग वाले विचार के लोग कमजोर पड़ गए। इसी तरह अल-कायदा और खुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले संगठन भी सैय्यद कुतुब के विचार से बहुत प्रभावित हैं। इस तमाम बहस के बाद अब सवाल ये पैदा होता है कि क्या समकालीन हालात में इस्लामी खिलाफत (जिसे कभी-कभी इस्लामी हुकूमत भी कहते हैं) की फिर से स्थापना संभव है?

'इस्लामी खिलाफत' का आकर्षण

हकीकत तो ये है कि इस्लामी खिलाफत का सपना बहुत ही मीठा और आकर्षण भरा है। अभी तक इस सपने ने बहुत से मुसलमान नौजवानों को अपनी ओर आकर्षित भी किया है। इस्लामवादी तत्व इस नतीजे पर पहूंच गए लगते हैं कि अगर इस्लामी खिलाफत का झंडा लेकर आगे बढ़ें तो लोगों को अपने साथ ला सकेंगे और समाज में प्रभाव भी फैला सकेंगे। 

इस्लामवादी विचारक अपने इस विचार का खूब प्रचार प्रसार कर रहे हैं कि 'खिलाफत' मूल इस्लाम है और इसका विरोध करने वाले इस्लाम से दगा करने वाले हैं और इस्लाम के दुश्मन हैं। साथ ही ये इस्लामवादी विचारक ये भी कहते हैं कि इस्लाम का 'स्वर्ण युग' और उसका दबदबा खिलाफत के कारण ही था और आज के मुसलमानों का पिछड़ापन खिलाफत नहीं रहने के कारण ही है।

'इस्लामी एकता'

इन विचारकों का ये भी मत है कि इस्लामी खिलाफत से पहले इस्लामी एकता हासिल करना जरूरी है। वे मानते हैं कि इस्लामी दुनिया की भौगोलिक और सांस्कृतिक भिन्नता में एकता ही इस्लाम की शक्ति है और इसी पर इस्लामी साम्राज्य की मजबूती है। इस्लामी खिलाफत के पक्षधर ये भी मानते हैं कि खिलाफत ही के कारण मुसलमानों ने क्रूसेड्स (10 से 12वीं सदी में मुसलमानों और इसाइयों के बीच हुई लड़ाई) में पश्चिम की शक्ति को पराजित किया था और खोए हुए अपने भू-भाग को दोबारा हासिल किया था और अगर अब भी चाहें तो इस्लामी खिलाफत की दोबारा बहाली कर के पश्चिम के वर्चस्व से बाहर आ सकते हैं। लेकिन 'इस्लामी खिलाफत' के सपने का साकार होना संभव नहीं है।

आधुनिक राष्ट्र-राज्य

आज की वास्तविक परिस्थिति से ये जाहिर है कि इस्लामी खिलाफत की दोबारा बहाली संभव नहीं है और जो लोग इस कोशिश में लगे हैं, वे हवा में सोचते हैं। आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के साथ, राज्य की स्थापना के मापदंड में भी बदलाव आया है। इसमें सबसे अहम है कि राज्य के पास एक निश्चित भू-भाग हो लेकिन वहीं धर्म बहुत कम महत्व का रह गया है। समकालीन समाज का ताना बाना पुराने जमाने के समाज की रूपरेखा से पूरी तरह से अलग है। इसलिए जो इस ख्याल में रहते हैं कि इस्लामी साम्राज्य की दोबारा स्थापना होगी वो अतीत में जी रहे हैं।

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islamic Caliphate
मुस्लिम जगत की समस्याएं

आज अंतरराष्ट्रीय संबंध आपसी लाभ पर आधारित हैं न कि धार्मिक निष्ठा और भावना पर। एक महत्वपुर्ण बिंदु ये भी है कि आज का मुस्लिम जगत अलग-अलग मतों को मानने वालों और समूहों में बंटा हुआ है। और अगर इनके बीच एकरूपता थोपी जाएगी तो आपस में युद्ध की आग भड़क सकती है जिससे मुस्लिम जगत की समस्याएं और बढ़ेंगी। 

एक और महत्वपूर्ण दिक्कत ये है कि इस्लामी खिलाफत के विचारकों और समर्थकों में भी वैचारिक एकता नहीं है। एक समूह का मत है कि इस्लामी खिलाफत का उद्देश्य जिहाद, युद्ध और काफिरों की जमीन पर कब्जा करना है, जबकि दूसरे समूह का मानना है कि इस्लामी खिलाफत के अंदर केवल इस्लामी कानून का लागू करना भर उद्देश्य है।

सियासी आजादी की जमानत

इतना ही नहीं एक ऐसा भी समूह है जो चाहता है कि इस्लामी खिलाफत एक ऐसी हुकूमत कायम करेगी जो सियासी आजादी की जमानत भी देगी और व्यक्ति कि आजादी का भी सम्मान करेगी। 'इस्लामी खिलाफत' के परिभाषा में जो मतभेद हैं, उसका कारण ये है कि इसके विचारक अब तक इस्लामी राज्य के संचालन पर कोई ठोस विचार नहीं दे पाए हैं। 

कुछ इस्लामी विद्वान और विचारक ये मानते हैं कि 'खिलाफत' एक थियोक्रेटिक राज्य (धर्माधरित राज्य) होगा।
लेकिन सच ये है कि खिलाफत का राज्य संचालन का ढांचा खोखला नजर आ रहा है और यह आज के सामाजिक हालात से मेल नहीं खाता है। और इसी कारण बीते जमाने में भी इस्लामी राज्य उथल-पुथल के शिकार रहे हैं।

खिलाफत का सपना

इस्लामी राज्य या खिलाफत एक ही सूरत में सफल हो सकता है कि पूरे खिलाफत में एक ही शासक हो, कोइ सीमा न हो, भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता हो, जो आज के जमाने में संभव ही नहीं है। इस्लामी खिलाफत का ख्वाब देखने वालों को अगर एक तरफ रख दें और देखें तो इस्लामी खिलाफत के दौरान मुसलमानों के बीच कभी भी एकता रही ही नहीं। वे अक्सर आपस में लड़ते रहे, खिलाफत कभी भी उन को एकजुट कर ही नहीं पाया, और इसी कारण बाहरी दुश्मन का भय दिखा कर उनको एकजुट करने की कोशिश करनी पड़ती थी।

इस्लामी खिलाफत के पक्षधर अब तक क्या हासिल कर पाए हैं?

इस्लामवादी सगठनों के अनेकों सदस्यों ने पिछले कई दशकों में खासकर उस्मानी खिलाफत के पतन के बाद खिलाफत की दोबारा स्थापना के अपने मकसद में जान गंवाई है।

निरंकुश तानाशाही

मगर ये कुर्बानी और ये कोशिश सही दिशा में नहीं थी, न केवल ये कि ये लोग अपनी कोशिश में नाकाम रहे बल्कि इन्होंने अतिवादी सोच को बढ़ावा दिया। इससे इस्लामी जगत को फायदे के बजाय बहुत नुकसान उठाना पड़ा और मुस्लिम जगत को घायल और लहूलुहान कर दिया। उदाहरण के तौर पर अफगानिस्तान में इख्वानुल मुसलेमीन की पिछले 90 साल की कोशिश का यह नतीजा निकला कि इस क्षेत्र में दमनकारी निरंकुश तानाशाही को आगे बढ़ने का मौका मिला।

ये तानाशाह पश्चिमी दुनिया को ये यकीन दिलाने में सफल रहे कि अगर इन धर्मांध लोगों को हम नहीं रोक पाए और हमारी सहायता नहीं की गई तो ये उसी प्रकार का समाज खड़ा करेंगे जैसा समाज यूरोप में फ्रांस की क्रांति (1789) से पहले था। ये एक ऐसे समाज की स्थापना करने की बात करते हैं जो विकास और आधुनिकता का घोर विरोधी है।

इंसान की आजादी

अगर इस्लामवादी ताकतें अब भी चाहें तो बदलाव और विकास में अपना योगदान दे सकती हैं। इनके लिए बेहतर ये है कि पुराने घिसेपिटे समाज को दोबारा जिंदा न कर, एक नए, सभ्य और आधुनिक समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं। एक ऐसे सियासी निजाम के लिए कोशिश करें जो लोगों की आकांक्षाओं और उम्मीदों पर आधारित हो, जहां इंसान की आजादी की कदर हो। इस्लामवादियों को अपने अतीत से सबक सीखते हुए ये मान लेना चाहिए कि कोई भी राजनीतिक ढांचा कमियों से खाली नही है और खिलाफत का निजाम तो आज की परिस्थिति में कत्तई कामयाब नहीं हो सकता है। 

इस्लामवादियों के प्रचार के अतिरिक्त इस्लामी खिलाफत का कोई ठोस प्रमाण इस्लामी ग्रंथों या इतिहास में नहीं मिलता है। बल्कि धर्मभ्रष्ट मुस्लिम हुकमरानों के कारनामों को वाजिब ठहराने के लिए उनके दरबारी उलेमाओं ने इस तरह से व्याख्या की कि उसे खिलाफत का रंग दिया जा सके और निरंकुश शासन को बनाए रखा जा सके। कुछ ऐसे भी इस्लामवादी हैं जो इस्लाम के इतिहास को ही असली इस्लाम मानते हैं, ऐसा करके वे लोग असल में इस्लाम के पथ से विमुख हो गए हैं।
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