रूसी रॉकेट से ईरान के उपग्रह को छोड़े जाने के बाद पश्चिमी मीडिया में ये सवाल चर्चित हो गया है कि क्या रूस ईरान को आधुनिक सैनिक क्षमता से लैस कर रहा है। अमेरिका सरकार ने सार्वजनिक रूप से इस पर चिंता जताई है, जिस पर ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। रूस और ईरान दोनों ऐसे देश हैं, जिन पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने प्रतिबंध लगा रखा है। विश्लेषकों के मुताबिक रूस और ईरान के बीच सामने आया नया संबंध इन प्रतिबंधों को काफी हद तक बेअसर कर सकता है।
रूस ने अपने सोयूज रॉकेट से नौ अगस्त को ईरान के उपग्रह खय्याम को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया। रॉकेट कजाखस्तान स्थित बाइकोनूर अंतरिक्ष केंद्र से छोड़ा गया। ईरान का दावा है कि खय्याम उपग्रह को उसने पूरी तरह से अपने देश के अंदर ही निर्मित किया है। ईरानी अधिकारियों के मुताबिक ईरान अंतरिक्ष आधारित सैनिक क्षमता के मामले में आत्म निर्भर होना चाहता है। इस लिहाज से रूस के साथ उसका रणनीतिक संबंध बेहद अहम हो गया है।
ईरान प्रेस नाम की न्यूज एजेंसी की वेबसाइट पर दिए गए ब्योरे के मुताबिक खय्याम का इस्तेमाल ईरान की अपनी सीमा के बाहर भी खेती, जमीन के उपयोग, जंगल और पर्यावरण आदि की निगरानी के लिए कर सकेगा। साथ ही इसके जरिए जमीन के अंदर मौजूद खनिज का पता लगाया जा सकता है। अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक रूस भी इस उपग्रह का इस्तेमाल करना चाहता है। वह इसके जरिए यूक्रेन में यूक्रेनी सेना के ठिकानों का पता लगाने में सक्षम हो जाएगा। इसी अखबार की एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक इस उपग्रह के जरिए ईरान पूरे पश्चिम एशिया की अंतरिक्ष से निगरानी करने में सक्षम हो जाएगा।
ईरान सरकार ने इन अटकलों का खंडन किया है कि खय्याम का उपयोग रूस भी करेगा। उसका दावा है कि खय्याम के एल्गोरिद्म ईरानी अंतरिक्ष एजेंसी (आईएसए) ने डिजाइन किया है, जो पूरी तरह इन्क्रिप्टेड है। यानी इससे प्राप्त होने वाली सूचनाओं को ईरान के अलावा कोई अन्य देश नहीं पढ़ सकेगा।
पश्चिमी विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल रूस और ईरान की स्थिति एक जैसी है। दोनों पर सख्त प्रतिबंध लगे हुए हैं। इसलिए दोनों आपस में मिल कर प्रतिबंधों को नाकाम करने की कोशिश करें, यह उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होगी। पिछले महीने दोनों के बीच कई समझौते हुए थे। उनमें डिजिटल सेवाएं, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और दूससंचार उपकरण विकसित करने के प्रावधान हैं। इसके अलावा दोनों देशों ने रूस के शहर सेंट पीटर्सबर्ग में एक साझा टेक्नोलॉजी सेंटर स्थापित करने का फैसला किया है।
इन घटनाक्रमों से पश्चिमी देशों के कान खड़े हो गए हैं। ईरान और रूस ऩे इसके पहले ड्रोन विकसित करने के लिए भी सहयोग किया था। उधर इन दोनों देशों के चीन के साथ संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक अब तक इन संबंधों से सिर्फ आर्थिक पहलू जुड़े थे। लेकिन उपग्रह छोड़े जाने के साथ इसमें सैनिक पहलू भी जुड़ गया है। समझा जाता है कि उसका इस क्षेत्र में और वैश्विक सुरक्षा संतुलन के लिए गंभीर और दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।