ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने जॉर्डन में मौजूद दो अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। यह कार्रवाई अमेरिका की ओर से ईरान के लारक द्वीप पर किए गए हमले के बाद की गई बताई जा रही है।
ईरान का यह दावा अमेरिकी कार्रवाई के कुछ ही समय बाद सामने आया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, लारक द्वीप पर ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड की ऐसी मिसाइल लॉन्चर गतिविधियां देखी गई थीं, जिनसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री सुरंगें बिछाने की तैयारी का अंदेशा था। इसके बाद अमेरिकी सेना ने वहां दो लॉन्चरों को निशाना बनाया।
लारक द्वीप पर अमेरिकी कार्रवाई के बाद ईरान के IRGC ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी थी। ईरानी पक्ष ने अमेरिकी हमले को गंभीर गलती बताते हुए कहा था कि इसके परिणाम भुगतने होंगे। इसके बाद जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने का दावा सामने आया। हालांकि, मिसाइल हमले से संबंधित नुकसान और प्रभाव को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
इस बीच अमेरिका में भी ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान को लेकर चिंता सामने आई है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना के कई शीर्ष अधिकारियों ने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को चेतावनी दी है कि ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान को लंबे समय तक जारी रखना टिकाऊ नहीं है और इससे दुनिया के दूसरे हिस्सों में अमेरिकी सैन्य क्षमता प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों के साथ यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका में अमेरिकी अभियानों की कमान संभालने वाले वरिष्ठ अधिकारियों ने इस मुद्दे पर अपनी चिंताएं दर्ज की हैं।
वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार, नौसेना प्रमुख एडमिरल डैरिल काउडल ने भी ईरान युद्ध के लिए मौजूदा स्तर के समर्थन को लंबे समय तक जारी रखने को लेकर चिंता जताई। रिपोर्ट में कहा गया है कि लगातार तैनाती से जहाजों के रखरखाव और भविष्य की सैन्य तैयारियों पर असर पड़ सकता है। कुछ अमेरिकी सैनिकों की मध्य पूर्व में तैनाती सितंबर तक और कुछ की 2027 तक बढ़ाए जाने की संभावना बताई गई है। इससे अमेरिकी सैन्य नेतृत्व के सामने संसाधनों और वैश्विक सैन्य तैयारियों के बीच संतुलन की चुनौती बढ़ गई है।