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ईरान में संकट: राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने की इस्तीफे की पेशकश, कहा- सब कुछ कमांडरों के हाथ, सरकार बेबस

Mon, 01 Jun 2026 12:49 AM IST
राकेश कुमार वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला।

सार

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने सैन्य कमांडरों के बढ़ते दखल और सरकार के पंगु होने का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया है। इस फैसले ने ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व में रार को दुनिया के सामने ला दिया है, जिससे देश में बड़ा राजनीतिक गतिरोध पैदा हो गया है।
 
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ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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ईरान की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अपने पद से आधिकारिक तौर पर इस्तीफा दे दिया है। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने अपना इस्तीफा सीधे सुप्रीम लीडर के दफ्तर को भेजा है। इस अप्रत्याशित कदम ने देश के शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान को सरेआम कर दिया है।
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फैसले लेने की आजादी छीनी, सरकार हुई पंगु
सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रपति पेजेशकियन ने अपने इस्तीफे में बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने साफ लिखा है कि देश के बड़े और बेहद जरूरी फैसलों से राष्ट्रपति और सरकार को पूरी तरह अलग थलग कर दिया गया है। राष्ट्रपति के मुताबिक, इस हालात की वजह से जो खालीपन पैदा हुआ, उसका फायदा कट्टपंथी धड़ों ने उठाया। अब आईआरजीसी के कमांडर देश के तमाम मामलों को अपनी मर्जी से चला रहे हैं।
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आईआरजीसी के दखल से काम करना हुआ नामुमकिन
पेजेशकियन ने कहा है कि मौजूदा हालातों में उनके लिए सरकार चलाना मुमकिन नहीं रह गया है। वे अपनी कानूनी जिम्मेदारियां निभाने में खुद को पूरी तरह असमर्थ पा रहे हैं। इसी वजह से उन्होंने बिना किसी देरी के तुरंत पद छोड़ने की मांग की है। हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि मोजतबा खामेनेई इस इस्तीफे को स्वीकार करेंगे या नहीं। लेकिन इस पत्र ने ईरान की सत्ता के शीर्ष पर मौजूद गहरी और अभूतपूर्व दरार को उजागर कर दिया है।
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महीनों से जारी था टकराव, बातचीत पर लगा ब्रेक
यह बड़ा घटनाक्रम सरकार और सैन्य-सुरक्षा संस्थाओं के बीच महीनों से चल रहे तनाव का नतीजा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आईआरजीसी ने धीरे-धीरे राष्ट्रपति के कई अधिकारों को सीमित कर दिया था। इसके बाद सरकार के अहम हिस्सों पर सीधे कब्जा कर लिया गया। जानकारों की मानें तो इसी वजह से पेजेशकियन प्रशासन पूरी तरह राजनीतिक और प्रशासनिक गतिरोध में फंस गया था। इस कड़वाहट के कारण न तो कूटनीतिक बातचीत आगे बढ़ पा रही थी और न ही कैबिनेट में जरूरी बदलाव लागू हो पा रहे थे।
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