परमाणु डील को अंतिम रूप देने में हो रही देर से ईरान में बेसब्री बढ़ रही है। परमाणु डील को पुनर्जीवित करने के लिए दस महीने से भी ज्यादा समय से ईरान की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों और जर्मनी के साथ बातचीत चल रही है। इन पक्षों के बीच परमाणु समझौता 2015 में हुआ था। उसका मकसद ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना था। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका को उस समझौते से बाहर कर लिया और ईरान पर पहले से भी ज्यादा सख्त प्रतिबंध लगा दिए।
इस बीच रूस की एक मांग से समझौते की राह में एक नया पेंच आ गया था। रूस ने पश्चिमी देशों से यह गारंटी मांगी थी कि उसके ईरान से कारोबारी संबंधों को रूस पर लगाए गए नए प्रतिबंधों से प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा। बताया जाता है कि इस बारे में पश्चिमी देशों ने रूस को लिखित गारंटी दे दी है। लेकिन ईरानी पर्यवेक्षकों का कहना है कि ऐसी तमाम प्रगति के बावजूद ऐसा नहीं लगता कि बहुत जल्द समझौता हो पाएगा।
ईरान के विश्लेषकों का कहना है कि अभी भी कुछ मुद्दों पर ईरान और अमेरिका के बीच मतभेद बना हुआ है। इनमें एक प्रमुख यह है कि क्या ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) को अमेरिका आतंकवादी संगठनों की सूची से हटाएगा। आईआरजीसी ईरान का प्रमुख सुरक्षा बल है। ईरान के अधिकारियों का कहना है कि आईआरजीसी का मुद्दा उनके लिए रेड लाइन है। यानी जब तक यह हल नहीं होता, ईरान समझौते पर दस्तखत नहीं कर सकता।
उधर बताया जाता है कि ईरान से समझौते के खिलाफ अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडन पर दबाव बढ़ गया है। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसदों का एक प्रभावशाली समूह आईआरजीसी के मुद्दे पर कोई नरमी बरतने के खिलाफ है। बाइडेन के लिए उनकी अनदेखी करना आसान नहीं है।