यूक्रेन में जारी युद्ध से यूक्रेन और रूस को भले नुकसान हो रहा हो, लेकिन ईरान के लिए ये युद्ध फायदे का मौका साबित हुआ है। ये बात इस सोमवार को खुल कर जाहिर हो गई, जब ये खबर आई कि ईरान में बने ड्रोन का इस्तेमाल रूस ने यूक्रेन की राजधानी कीव पर हमला करने के लिए किया है। इस हमले में यूक्रेन की राष्ट्रीय ऊर्जा कंपनी के मुख्यालय को भारी क्षति पहुंची। बताया जाता है कि उस हमले में चार लोग मारे गए।
ईरान उन देशों में है, जिसने इस युद्ध में खुल कर रूस का समर्थन किया है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक ईरान ने यह रुख अपने दीर्घकालिक सुरक्षा और कूटनीतिक हितों को साधने के लिए अपनाया है। इस खबर से दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों को हैरत हुई है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन युद्ध में बढ़त बनाने के लिए ईरान में बने हथियारों का इस्तेमाल करने का फैसला किया। इसके पहले रूस ऐसा सीरिया में भी कर चुका है। सीरिया के गृह युद्ध में रूस ने वहां के राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन किया है।
विशेषज्ञों ने कहना है कि जहां ईरानी ड्रोंस से रूस को बड़ी मदद मिली है, वहीं ईरान से सहायता लेकर रूसी राष्ट्रपति पुतिन अपने राष्ट्रीय हित साधने में ईरान के सहायक बने हैं। 1979 में देश में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान के अमेरिका से शत्रुतापूर्ण संबंध रहे हैं। ईरान अपने आर्थिक और सुरक्षा संबंधी मकसदों को हासिल करने में अमेरिका को सबसे बड़ी रुकावट मानता रहा है।
पश्चिम एशिया मामलों के विश्लेषक और अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ डेनवर में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर एरॉन पिल्किंगटन के मुताबिक अमेरिका के प्रति पुतिन और ईरान के इस्लामिक शासकों का वैर उन्हें करीब ले आया है। वैसे रूस और ईरान के संबंध जटिल रहे हैं। पिल्किंगटन ने ऑस्ट्रेलियाई वेबसाइट कन्वर्सेशन के लिए लिखे एक विश्लेषण में कहा है कि दोनों देशों के निकट आने की शुरुआत सीरियाई गृह युद्ध से हुई। वहां दोनों देश बशर अल-असद के रक्षक बन कर खड़े हुए। जबकि पश्चिमी देशों का समर्थन अल-असद विरोधियों के साथ था।
विशेषज्ञों के मुताबिक यूक्रेन युद्ध ने दोनों देशों को बेहद करीब ला दिया है। जिस समय पश्चिमी देशों ने न सिर्फ दोनों देशों का बहिष्कार कर रखा है, उस समय आपसी रिश्तों के जरिए उन्होंने दुनिया को संदेश दिया है कि वे अकेले नहीं हैं।
पिल्किंगटन के मुताबिक ईरान पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभाव को खत्म करना चाहता है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने तो अब पूरी दुनिया पर से अमेरिकी वर्चस्व को खत्म करने का मकसद खुलेआम घोषित कर दिया है। इससे दोनों देशों के हित आपस में जुड़ गए हैं। ईरान इसके पहले वेनेजुएला, उत्तर कोरिया, और चीन के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने को खास अहमियत दे रहा था। अब इस धुरी में रूस भी शामिल हो गया है।
ईरान के कम लागत से बने लेकिन युद्ध कुशल ड्रोन पहले से चर्चित रहे हैं। अब रूस इनके लिए एक नया बड़ा बाजार बन गया है। रूसी अधिकारी शाहेद-129 और शाहेद-191 नाम के इन ड्रोन के संचालन की ट्रेनिंग लेने ईरान गए थे। इनके अलावा रूस ने शाहेद-136 और मोहाजेर-6 ड्रोन भी ईरान से खरीदे हैं। अब वह इनका इस्तेमाल यूक्रेन पर हमला करने में कर रहा है।
ईरानी नेतृत्व को उम्मीद है कि रूसी हमलों में ईरानी ड्रोन की कुशलता साबित होने के बाद कई दूसरे देश भी इन्हें खरीदने के लिए आगे आ सकते हैं। विशेषज्ञों ने भी कहा है कि रूस दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। इसके बावजूद अगर उसने ईरान से हथियार खरीदे हैं, तो इससे ईरान के अस्त्र उद्योग को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा मिलेगी।