अब ये साफ होने लगा है कि घरेलू कारणों से विदेश नीति में जो बाइडन प्रशासन कोई साहसी पहल नहीं कर पा रहा है। इससे अब ये उम्मीद टूट रही है कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जमाने में जो अंतरराष्ट्रीय टकराव पैदा हुए थे, नया प्रशासन उन्हें कम करने की दिशा में कोई ठोस पहल करेगा। इस पर सबसे स्पष्ट प्रतिक्रिया ईरान की तरफ से आई है। ईरान ने एलान कर दिया है कि उसकी यूरोपियन यूनियन (ईयू) की तरफ से आयोजित उस वार्ता में भाग लेने की कोई इच्छा नहीं है, जिसका मकसद ईरान परमाणु डील में फिर जान फूंकना है।
रान ने कहा है कि चूंकि अमेरिका ने उस पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है, इसलिए वह इस बातचीत में नहीं शामिल होना चाहता। वैसे कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि ईरान का रुख सऊदी अरब के प्रति बाइडन प्रशासन के नरम रवैये से भी प्रभावित हुआ है। बाइडन प्रशासन ने उस अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट को जारी कर दिया, जिसमें पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के लिए सऊदी युवराज सलमान को जिम्मेदार ठहराया गया। लेकिन अमेरिका ने युवराज सलमान के खिलाफ कोई कार्रवाई करने से इनकार कर दिया है। इसके पीछे प्रमुख वजह यही मान गई है कि ईरान को नियंत्रित करने की अमेरिकी नीति में सऊदी अरब की प्रमुख भूमिका है। इसलिए अमेरिका उसे नाराज नहीं करना चाहता।
इसके पहले राष्ट्रपति जो बाइडन ने दो टूक कहा था कि जब तक ईरान 2015 में हुए समझौते का फिर से पालन शुरू नहीं करता, उस पर लगे प्रतिबंधों को नहीं हटाया जाएगा। जबकि ईरान का कहना है कि पहले प्रतिबंध लगाए गए थे। उसके बाद उसने समझौते की शर्तों को तोड़ा। इसलिए पहले अमेरिका को प्रतिबंध हटाने चाहिए। इसी टकराव के बीच ईयू समझौते को दोबारा लागू करवाने के लिए 2015 के करार में शामिल सभी पक्षों की बैठक आयोजित करने का एलान किया था। तब बाइडन प्रशासन ने कहा था कि वह इसमें शामिल होने के तैयार है, लेकिन वह पहले ये जानना चाहता है कि समझौते पर अमल के लिए ईरान क्या कदम उठाएगा।
जानकारों के मुताबिक ईयू ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है। आगे किसी तारीख पर बातचीत हो सके, इसके लिए वह नए सिरे से पहल करने पर विचार कर रहा है। लेकिन इस बीच यह भी चर्चा है कि ईयू इसी हफ्ते वियना में होने वाली अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक में ईरान की निंदा का एक प्रस्ताव लाने वाला है। ऐसा हुआ तो बातचीत की संभावना और धूमिल हो जाएगी। इस प्रस्ताव पर ईरान की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया की आशा है।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अमेरिका में सत्ता बदलने के बावजूद अमेरिकी नीति और व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है। मंत्रालय के प्रवक्ता ने तेहरान में कहा कि 2015 में हुए समझौते में सभी पक्षों ने जो वादे किए थे, उन पर फिर से बातचीत और लेन-देन की गुंजाइश नहीं है। वो समझौता लेन-देन का ही परिणाम था। इसलिए आगे का रास्ता साफ है। अमेरिका अपने ‘अवैध और एकतरफा’ प्रतिबंधों को तुरंत हटाए और अपनी वचनबद्धाओं का पालन करे। इसके लिए किसी बैठक या आईएईए के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक में किसी प्रस्ताव की जरूरत नहीं है।
इस तरह ईरान ने साफ कर दिया है कि अगली वार्ता तभी संभव है, जब अमेरिका प्रतिबंध उठा ले। या कम से कम इस दिशा में पहल करे। ऐसा वह प्रतिबंध के तहत जब्त की गई किसी एक ईरानी संपत्ति को मुक्त करके कर सकता है। लेकिन जो बाइडन प्रशासन ऐसा कोई कदम उठाने के मूड में नहीं दिखता, जिससे अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी और पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थकों को उसे कमजोर बताने का मौका मिले। ट्रंप समर्थकों का दबाव इस मामले में निर्णायक साबित हो रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय माहौल सुधरने की उम्मीदें टूट रही हैं।