बहाई लोगों के लिए कब्रिस्तान
बहाई लोगों का दमन
बहाई लोगों को उनके विशेष कब्रिस्तान में मुर्दों को दफन करने से रोकने, उनके कब्रिस्तान में तोड़-फोड़ और दफन लाशों को बाहर निकालकर फेंक देने के पीछे मकसद इस अल्पसंख्यक समुदाय को मिटाना और रोजमर्रा की जिंदगी में उनकी सामाजिक मौजूदगी खत्म करना है।
बहाई समुदाय पहले से ही मुसलमानों के कब्रिस्तान में अपने मुर्दे को दफन नहीं कर सकते हैं और अब नई घोषणा पर अमल करते हुए अपने सामुदायिक कब्रिस्तान में भी दफन नहीं कर पाएंगे तो फिर उनके लिए मुर्दा दफनाने की कोई जगह ही नहीं बचती है।
मुर्दा दफनाने से रोकने की ये घोषणा उस सिलसिले की एक कड़ी है जिसके तहत बहाई लोगों को अपने धार्मिक और सांस्कृतिक रीति रिवाज अपनाने और अपने पसंद की शिक्षा पाने से रोका जा रहा है। इन दबावों का एक उद्देश्य ये भी है कि बहाई समुदाय के लोग मजबूर होकर अपना धर्म छोड़ दें और इस्लाम कबूल कर लें।
इस्लाम का इतिहास
अपने सांस्कृतिक विरोधियों का इस तरह दमन करने का एक लंबा इतिहास रहा है।इस्लाम के तीसरे खलीफा उस्मान बिन अफ्फान की जब उनके विरोधियों ने हत्या कर दी तो उन्हें मदीना में उन यहूदियों के कब्रिस्तान में दफन किया गया जो मदीना छोड़कर चले गए थे।
बाद में मुआविया बिन अबु सुफयान ने मदीना में मुसलमानों के कब्रिस्तान का विस्तार करके उस्मान की कब्र को इस कब्रिस्तान में मिला लिया।यही कारण रहा है कि इस्लामी इतिहास के कई महापुरुषों को अज्ञात जगहों पर दफनाया गया ताकि उनके विरोधी उनकी कब्र को खोल न सकें। लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि बहाई समुदाय पर दमन करने वालों का लक्ष्य पूरा होगा।
प्रतिक्रिया की आशंका
अगर बहाई समुदाय के खिलाफ दमन और हिंसा में तेजी आती है तो स्वभाविक रूप से इसे लेकर प्रतिक्रिया भी होगी। बहाई लोग विरोध में एकजुट हो सकते हैं। इसके अलावा दमन के खिलाफ और बहाई समुदाय के लिए दूसरे लोगों में भी हमदर्दी पैदा होगी।
दुनिया के दूसरे देशों की तरफ़ से भी इस पर प्रतिक्रिया देने के आसार हैं।कब्र खोद कर मुर्दा निकालना इस्लामी कानून में भी ठीक नहीं माना जाता है और इसे मुर्दे और मृत व्यक्ति के रिश्तेदारों का अनादर और अपमान समझा जाता है। कब्र की खुदाई या कब्र को दोबारा खोलना उसी स्थिति में सही माना जाता है जब किसी हत्या के मामले को सुलझाने में इससे मदद मिले या मुर्दे के साथ छीना हुआ धन छुपाया गया हो।
ये बात भी केवल मुसलमानों की कब्र पर लागू होती है न कि दूसरे धर्मों के माननेवालों पर। तो क्या शव के अनादर की बात केवल मुसलमानों की कब्र पर ही लागू होगी और गैर-मुसलमानों की कब्रें इस इज्जत की हकदार नहीं हैं?