अमेरिका में आर्थिक मंदी की चर्चा विश्व बाजार के जानकारों के लिए रहस्य का विषय बनी हुई है। अमेरिका में लगातार दो तिमाहियों में अर्थव्यवस्था सिकुड़ने की पुष्टि हो चुकी है। आम तौर पर ऐसी स्थिति में किसी भी देश के मंदी में चले जाने की घोषणा कर दी जाती है। लेकिन जो बाइडन प्रशासन का दावा है कि अमेरिका में तमाम दूसरे आर्थिक संकेत सकारात्मक हैं। वहां रोजगार जाने, उद्योगों को भारी वित्तीय नुकसान होने या बड़ी संख्या में फैक्टरियों के बंद होने की कोई खबर नहीं हैं।
पिछले हफ्ते जारी आंकड़ों से सामने आया कि अप्रैल से जून के बीच अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 0.9 फीसदी गिरावट आई। उसके पहले जनवरी से मार्च तक अर्थव्यवस्था 1.6 फीसदी सिकुड़ी थी। इसके बावजूद अमेरिकी सेंट्रल बैंक- फेडरल रिजर्व के प्रमुख जिरोम पॉवेल ने कहा- ‘मेरी राय में अमेरिका में अभी मंदी नहीं है। अर्थव्यवस्था के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां प्रदर्शन काफी अच्छा है।’
लेकिन कई अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि फेडरल रिजर्व के ब्याज दर बढ़ाने की नीति पर आगे बढ़ने का परिणाम मंदी के रूप में ही सामने आएगा। ब्याज दर बढ़ने से महंगाई काबू में आ सकती है, लेकिन निवेश घटने से रोजगार के अवसर घटेंगे और उपभोक्ताओं को अपना हाथ समेटना पड़ेगा। इससे बाजार में मांग घट जाएगी। इन अर्थशास्त्रियों ने ध्यान दिलाया है कि अभी भी बाजार में उपलब्ध सामग्रियों की उम्मीद के मुताबिक बिक्री नहीं हो पा रही है।
सीबीआईजेड इन्वेस्टमेंट एडवाइजरी सर्विसेज में मुख्य निवेश अधिकारी अना रेथबन ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा कि 2021 की आर्थिक तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर में उछाल आया था। इस वजह से कंपनियों ने अपने भंडार को अधिक सामग्रियों से भर लिया। लेकिन बाद के छह महीनों में उन सामग्रियो की उम्मीद के मुताबिक बिक्री नहीं हुई। इस वजह से बाजार के कुछ हलकों में मंदी जैसा माहौल बना है।
निवेश एजेंसी मैन ग्रुप में वरिष्ठ अधिकारी एडवर्ड कोल के मुताबिक दो बातों पर खास नजर रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा- अगर उपभोक्ता कम चीजें खरीदेंगे, तो कंपनियां नए ऑर्डर नहीं देंगी। उसका असर कारखाना उत्पादन पर पड़ेगा। दूसरा पहलू यह है कि अगर कंपनियों को अपने भंडार की वस्तुएं बेचने के लिए भारी डिस्काउंट देना पड़ा, तो उसका असर उनके राजस्व और मुनाफे पर पड़ेगा। इससे मंदी के हालात गहराएंगे।
विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसलिए वहां उभरने वाले ट्रेंड का असर सारी दुनिया पर पड़ता है। समझा जाता है कि अगर अमेरिका गहरी मंदी का शिकार हुआ, तो उससे भारत और चीन जैसे देशों के निर्यात भी प्रभावित होंगे। नतीजतन, अमेरिकी मंदी फैलते हुए सारी दुनिया में पहुंच सकती है।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़े अर्थव्यवस्था चीन की आर्थिक वृद्धि दर पहले ही रफ्तार खो चुकी है। पिछले हफ्ते चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की विशेष बैठक में आर्थिक स्थितियों पर विचार किया गया। लेकिन उसके बाद जारी बयान में यह नहीं बताया गया कि चीन सरकार ने आर्थिक विकास दर के बारे में क्या नया लक्ष्य तय किया है। पहले चीन ने इस वित्त वर्ष के लिए 5.5 फीसदी की वृद्धि दर तय की थी। लेकिन अब इसे हासिल करना लगभग असंभव माना जा रहा है। समझा जाता है कि अगर अमेरिका के साथ चीन भी मंदी का शिकार हुआ, तो दुनिया में जारी आर्थिक मुसीबत और गंभीर रूप ले लेगी।