India-US: भारत और अमेरिका की नौसेनाओं ने डिएगो गार्सिया और हिंद महासागर के पास पनडुब्बी-रोधी युद्ध और समुद्री क्षेत्र की जागरूकता पर केंद्रित संयुक्त अभ्यास किया। इस अभ्यास में दोनों देशों के पी-8 विमान और चालक दल ने मिलकर संचालन योजना बनाई और तट आधारित चरण में उड़ान, पनडुब्बी-रोधी और संचार अभ्यास किया।
भारत और अमेरिका ने पनडुब्बी-रोधी युद्ध (एएसडब्ल्यू) और समुद्री क्षेत्र में जागरूकता पर केंद्रित संयुक्त युद्ध अभ्यास किया, ताकि दोनों नौसेनाओं के बीच आपसी तालमेल और क्षमता को मजबूत किया जा सके। अमेरिका के सातवें बेड़ा ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, अमेरिका और भारत की नौसेनाएं साथ उड़ान भर रही हैं। डिएगो गार्सिया के पास संयुक्त पी-8 प्रशिक्षण ने पनडुब्बी-रोधी युद्ध कौशल और समुद्री क्षेत्र की जागरूकता को निखारा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने की हमारी सामूहिक क्षमता को बढ़ाया।
रक्षा दृश्य सूचना वितरण सेवा (डीवीआईडीएस) ने एक आधिकारिक बयान में कहा, 'कमांडर टास्क फोर्स 72' (सीटीएफ) के मिशन में समुद्री गश्ती और टोही विमान (एमपीआरए) पी-8ए पोसाइडन ने भारतीय नौसेना के एमपीआरए पी-8आई के साथ डिएगो गार्सिया और हिंद महासागर के पास संयुक्त अभ्यास में भाग लिया। यह अभ्यास 22 से 28 अक्तूबर के बीच आयोजित किया गया था।
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पी-8आई के डिएगो गार्सिया पहुंचने के बाद अमेरिकी और भारतीय चालक दल ने अभ्यास के लिए संचालन योजना पर मिलकर काम किया, जिससे समुद्री में सूचना साझा करने और सहयोग की नींव रखी गई। इस तट आधारित चरण को संयुक्त उड़ान और द्विपक्षी पनडुब्बी-रोधी और संचार अभ्यास के साथ पूरा किया गया।
बयान में कहा गया, पैट्रोल स्क्वाड्रन (वीपी) 4 को सीटीएफ 72 में तैनात किया गया, जो अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े समुद्री गश्ती और टोही विमानों के लिए कमान एवं नियंत्रण मुख्यालय है। यह बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से क्षेत्रीय सुरक्षा और संचालन को बढ़ावा देता है और निगरानी व टोही की क्षमताएं प्रदान करता है।
अमेरिकी नौसेना का सातवां बेड़ा अग्रिम मोर्चे पर तैनात सबसे बड़ा बेड़ा है। यह बेड़ा अपने नियमित रूप से अपने साझेदारों के साथ संवाद करता है, ताकि एक स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के दृष्टिकोण को साकार किया जा सके।बयान में बताया गया कि यह प्रशिक्षण टाइगर ट्रायम्फ 2025 जैसे पहले के अंतर संचालन अभ्यासों पर आधारित था। इन अभ्यासों में भारतीय और अमेरिकी सशस्त्र बलों ने संयुक्त संचार और युद्ध क्षमता बढ़ाने के लिए उपग्रह और बिना चालक वाले (अनमैन्ड) तकनीकों का उपयोग किया।