न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में भारत ने पारंपरिक हथियारों, बारूदी सुरंगों, आतंकवाद और सैन्य क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के इस्तेमाल को लेकर अपना पक्ष रखा। भाजपा की लोकसभा सांसद कमलजीत सहरावत ने कहा कि हथियारों से जुड़ी नीतियां बनाते समय देशों की सुरक्षा जरूरतों और मानवीय चिंताओं, दोनों का ध्यान रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत पारंपरिक हथियारों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के सभी पांच प्रोटोकॉल के प्रति प्रतिबद्ध है। साथ ही, भारत रक्षा क्षेत्र में भरोसेमंद एआई को बढ़ावा देने और अवैध हथियारों के व्यापार व आतंकवाद से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करने के पक्ष में है।
सैन्य जरूरत और मानवीय चिंताओं में संतुलन जरूरी
कमलजीत सहरावत ने कहा कि भारत का मानना है कि पारंपरिक हथियारों से जुड़े नियमों की सबसे बड़ी ताकत सैन्य जरूरतों और मानवीय अनिवार्यताओं के बीच संतुलन कायम करने में है। इससे अलग-अलग सुरक्षा हितों वाले देशों को भी एक साझा अंतरराष्ट्रीय ढांचे के तहत साथ लाने में मदद मिलती है। उन्होंने विशेष रूप से पारंपरिक हथियार सम्मेलन (सीसीडब्ल्यू) के संशोधित प्रोटोकॉल-II का जिक्र किया। उनके मुताबिक, यह प्रोटोकॉल बारूदी सुरंगों से जुड़ी मानवीय चिंताओं और लंबी सीमाओं वाले देशों की जायज रक्षा जरूरतों के बीच संतुलन स्थापित करता है।
बारूदी सुरंगों और आईईडी के खतरे पर भारत का रुख
सांसद ने कहा कि भारत ने संशोधित प्रोटोकॉल-II के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन किया है। इसमें ऐसी बारूदी सुरंगों का उत्पादन नहीं करना शामिल है, जिनकी पहचान नहीं की जा सके। इसके अलावा, भारत सभी कार्मिक-विरोधी बारूदी सुरंगों को पहचान योग्य बनाने की प्रतिबद्धता का भी पालन करता है। उन्होंने कहा कि यह प्रोटोकॉल आतंकवादी संगठनों और अवैध सशस्त्र समूहों की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले तात्कालिक विस्फोटक उपकरणों (आईईडी) के खतरे से निपटने के लिए भी ढांचा उपलब्ध कराता है। भारत आईईडी के खतरे को कम करने और इनसे प्रभावित लोगों की मदद को उच्च प्राथमिकता देता है।
युद्ध के विस्फोटक अवशेषों से प्रभावित लोगों की मदद
कमलजीत सहरावत ने कहा कि भारत पारंपरिक हथियार सम्मेलन के प्रोटोकॉल-V का भी हस्ताक्षरकर्ता है। इस नाते भारत युद्ध के बाद बचे विस्फोटक अवशेषों से होने वाले मानवीय नुकसान को लेकर गंभीर है। उन्होंने बताया कि 'इंडिया फॉर ह्यूमैनिटी' पहल के तहत हाल के वर्षों में कई देशों में 15,000 से अधिक कृत्रिम अंग शिविर आयोजित किए गए हैं। इन शिविरों के माध्यम से जरूरतमंद लोगों को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया गया है।
सैन्य क्षेत्र में एआई के लिए भारत ने बनाया घरेलू ढांचा
सांसद ने सैन्य क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल पर भी भारत का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि भारत ने इस विषय पर संयुक्त राष्ट्र में हुई पहली अनौपचारिक चर्चा में रचनात्मक भागीदारी की और उसका सह-प्रायोजन भी किया। उन्होंने बताया कि भारत ने रक्षा क्षेत्र में भरोसेमंद एआई के मूल्यांकन के लिए घरेलू ढांचा तैयार किया है। यह ढांचा पांच प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है, विश्वसनीयता, सुरक्षा, पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता। भारत का जोर इस बात पर है कि रक्षा क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल इन मानकों को ध्यान में रखकर किया जाए।
अवैध हथियारों के व्यापार और आतंकवाद पर सहयोग
कमलजीत सहरावत ने कहा कि भारत छोटे हथियारों और हल्के हथियारों पर संयुक्त राष्ट्र की कार्ययोजना के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ट्रेसिंग इंस्ट्रूमेंट का समर्थन करता है। इन प्रयासों का उद्देश्य अवैध हथियारों की पहचान करने और उनकी आवाजाही का पता लगाने में सहयोग बढ़ाना है।
उन्होंने बताया कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले अवैध हथियारों के व्यापार से निपटने के लिए भारत काठमांडू स्थित संयुक्त राष्ट्र के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय केंद्र के साथ सक्रिय रूप से काम करता है। यह केंद्र शांति और निरस्त्रीकरण से जुड़े मुद्दों पर क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है।
18 देशों के प्रतिनिधियों ने फेलोशिप में लिया हिस्सा
सांसद ने बताया कि इस साल भारत ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में छोटे हथियारों और हल्के हथियारों के नियंत्रण से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र फेलोशिप की पहली बार मेजबानी की। इसमें 18 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य क्षमता निर्माण के सामूहिक प्रयासों को मजबूत करना है, ताकि क्षेत्र के देश हथियारों के नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर बेहतर तरीके से काम कर सकें।
शांतिपूर्ण इस्तेमाल के साथ वैश्विक व्यवस्था मजबूत करने पर जोर
कमलजीत सहरावत ने कहा कि भारत पारंपरिक हथियारों और दोहरे इस्तेमाल वाली प्रौद्योगिकियों के लिए वैश्विक अप्रसार व्यवस्था को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही, भारत इन तकनीकों के शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल को भी बढ़ावा देता है। भारत का रुख है कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े नियम बनाते समय देशों की रक्षा संबंधी जरूरतों और मानवीय हितों, दोनों को उचित महत्व मिलना चाहिए।