अजरबैजान के बाकू में कॉप29 सम्मेलन में जलवायु परिवर्तनों को लेकर चर्चा जारी है। इस बीच विकासशील देशों की आवाज को बुलंद करते हुए सम्मेलन में विकसित देशों पर नाराजगी जताई। भारत ने कहा कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन के मामले में विकासशील देशों को मदद देनने पर गंभीरता से चर्चा नहीं कर रहे। भारत ने यह भी साफ किया कि बिना आर्थिक और तकनीकी मदद के जलवायु परिवर्तन से निपटना नामुमकिन है।
कॉप29 के शमन महत्वाकांक्षा और कार्यान्वयन कार्य कार्यक्रम (एमडब्ल्यूपी) के दौरान शनिवार को भारत ने कहा कि विकसित देश, जो एतिहासिक तौर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार रहे हैं और जिनके पास ज्यादा संसाधन हैं, वे जलवायु परिवर्तन पर काम करने की क्षमता रखते हैं। लेकिन वे लगातार अपने लक्ष्य बदल रहे हैं और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाई में देरी कर रहे हैं।
भारत की तरफ से कॉप29 में उप प्रमुख वार्ताकार नीलेश साह ने कहा, "जलवायु परिवर्तन को लेकर विकासशील देशों के लिए जो मुद्दे अहम हैं, उन पर हमें कोई प्रगति (पिछले एक हफ्ते में) नहीं दिखी है। हमारा हिस्सा जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों से जूझ रहा है, जबकि हमारे पास इन प्रभावों से निपटने की क्षमता भी काफी कम है और इन जलवायु परिवरत्नों के लिए हम जिम्मेदार भी नहीं हैं।"
उन्होंने कहा कि एमडब्ल्यूपी का मकसद मदद करना है, न कि सजा देना और हमें सभी देशों के अधिकार और उनकी जरूरतों और हालात के आधार पर खुद के जलवायु लक्ष्यों का सम्मान करना चाहिए। साह ने कहा कि अगर जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए आर्थिक मदद, तकनीक और क्षमता नहीं बनाई जाती तो कई अर्थव्यवस्थाएं ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम नहीं कर पाएंगी और इनके प्रभावों में भी नहीं ढल पाएंगी।
भारत के वार्ताकार ने कहा, "आखिर हम जलवायु परिवर्तन के लिए एक्शन पर कोई चर्चा कैसे कर सकते हैं, जब हमारे लिए कोई भी काम ही नामुमकिन कर दिया गया है। खासकर तब जब जलवायु परिवर्तन के प्रभाव बढ़ रहे हैं।" उन्होंने कहा कि हमें अपनी विकास की जरूरतों को ऐसी स्थिति में पूरा करना होगा, जब कार्बन बजट घट रहा है और जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ रहा है। हमें वह देश जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई के लिए महत्वाकांक्षा दिखाने को कह रहे हैं, जो खुद इसके प्रति महत्वाकांक्षा नहीं रखते।