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भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता: ट्रंप टैरिफ के बीच भारत की आक्रामक कूटनीति, वैश्विक मंच पर कमजोर पड़ेगा अमेरिका

Thu, 29 Jan 2026 06:30 AM IST
शिवम गर्ग अमर उजाला नेटवर्क, वाशिंगटन।

सार

भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते से वैश्विक व्यापार संतुलन बदलता दिख रहा है। ट्रंप की टैरिफ नीति से अमेरिका का प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।

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भारत-ईयू एफटीए - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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लंबे समय तक जिस वैश्विक आर्थिक ढांचे में अमेरिका केंद्रीय भूमिका में रहा, अब उसी ढांचे में बड़ी आर्थिक ताकतें आपसी समझौतों से अपनी राह खुद तय करते दिख रही हैं। भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच लगभग दो दशकों बाद हुआ मुक्त व्यापार समझौता इसी बदलाव का सबसे ठोस संकेत है।

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यह डील भारत–ईयू संबंधों से आगे जाकर अमेरिका–भारत व्यापार वार्ता, ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति और उभरते वैश्विक शक्ति संतुलन पर सीधे असर डालती है। भारत-ईयू में हुए मुक्त व्यापार समझौते के तहत दोनों पक्ष एक-दूसरे के आयात पर चरणबद्ध तरीके से टैरिफ समाप्त करेंगे। सीएनबीसी के अनुसार, इससे भारत को यूरोप के विशाल-स्थिर बाजार तक आसान पहुंच मिलेगी, जबकि यूरोपीय कंपनियों को भारत जैसे तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजार में निवेश और निर्यात के नए अवसर मिलेंगे। यह समझौता भारत की आक्रामक व्यापार कूटनीति और ईयू की रणनीतिक विविधीकरण नीति का साझा परिणाम माना जा रहा है।

अमेरिका–भारत व्यापार वार्ता पर सीधा असर
ईयू–भारत व्यापार समझौता अमेरिका-भारत समझौते को आगे बढ़ाने में नई जान फूंक सकता है। वॉशिंगटन में यह धारणा मजबूत हो रही है कि यदि अमेरिका भारत के साथ ठोस समझौता नहीं करता, तो नई वैश्विक व्यापार संरचना में उसकी पकड़ अब कमजोर पड़ सकती है।
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बीस साल की जड़ता क्यों टूटी
भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत करीब 20 वर्षों तक अटकी रही। कृषि, ऑटोमोबाइल, टैरिफ संरचना और नियामकीय मतभेद इसके प्रमुख कारण रहे। वर्ष 2024 में दोनों के बीच वस्तुओं का व्यापार 142.3 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो भारत के कुल व्यापार का 11.5% है, इसके बावजूद सहमति नहीं बन सकी। इस बार हालात इसलिए बदले क्योंकि वैश्विक स्तर पर अमेरिका की टैरिफ नीति ने कई देशोे को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वे केवल एक शक्ति केंद्र पर निर्भर नहीं रह सकतीं।
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ट्रंप टैरिफ...दबाव की राजनीति और वैश्विक प्रतिक्रिया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ को केवल सौदेबाजी का हथियार नहीं, बल्कि दबाव और दंड की नीति के रूप में इस्तेमाल किया है। भारत पर कुल 50 प्रतिशत तक के अमेरिकी टैरिफ, जिनमें रूस से तेल खरीद बंद न करने पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क शामिल है, इसी रणनीति का उदाहरण हैं। यूरोपीय यूनियन भी इससे अछूता नहीं रहा,चाहे वह व्यापारिक टैरिफ हों या ग्रीनलैंड जैसे मुद्दों पर दी गई सख्त चेतावनियां। बीबीसी और सीएनबीसी के व्यापक विश्लेषण बताते हैं कि इसी अनिश्चितता ने भारत और यूरोपीय संघ को तेजी से एक-दूसरे के करीब आने के लिए प्रेरित किया।

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