भारत ने सोमवार को अमीर देशों से अपील की कि वे तकनीकी हस्तांतरण पर लगी बाधाएं खत्म करें, जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) में बढ़ोत्तरी करें, और जलवायु कार्रवाई के नाम पर लागू किए जा रहे अनुचित व्यापारिक कदमों से बचें।
'मजबूत और सतत भविष्य बनाने के लिए आवश्यक'
यह अपील संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता (यूएन क्लाइमेट टॉक्स) में 2030 से पहले के लक्ष्यों पर आयोजित एक उच्चस्तरीय मंत्रिस्तरीय बैठक में की गई। जहां भारत की पर्यावरण सचिव लीना नंदन ने अमीर देशों से कहा कि वे उत्सर्जन में कटौती और 2030 तक नेट-जीरो हासिल करने में नेतृत्व दिखाएं। उन्होंने कहा, यह एक मजबूत और सतत भविष्य बनाने के लिए आवश्यक है।
भारत की पर्यावरण सचिव लीना नंदन की टिप्पणी
भारत की पर्यावरण सचिव लीना नंदन ने कहा कि कम कार्बन वाले भविष्य के लिए नई तकनीकों का उपयोग महत्वपूर्ण है, लेकिन इन्हें विकासशील देशों के लिए सुलभ बनाना भी जरूरी है। उन्होंने कहा, विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा और कार्बन हटाने जैसी तकनीकों की जरूरत है, लेकिन बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) जैसी बाधाओं के कारण ये तकनीक उन्हें आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। COP 29 में ऐसे व्यावहारिक समाधान आने चाहिए, जो इन तकनीकों को किफायती, अनुकूल और विकासशील देशों के लिए उपयुक्त बनाएं।
ये हैं जलवायु वित्त की कमी के कारण
भारत ने यह भी कहा कि जलवायु वित्त की कमी के कारण विकासशील देशों में जलवायु कार्रवाई में देरी हो रही है। स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे और जलवायु अनुकूलन के लिए खरबों डॉलर की जरूरत है... यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विकासशील देशों के न्यूनतम लागत वाले विकास पथ से कोई विचलन न हो और इसके लिए अमीर देश सार्वजनिक वित्त प्रदान करें। ऐसा न करने पर विकासशील देशों के लोग जलवायु परिवर्तन का असमान भार उठाते रहेंगे, जबकि उन्होंने इस समस्या को पैदा नहीं किया है।
भारत ने कार्बन सीमा समायोजन तंत्र का किया कड़ा विरोध
भारत ने एकतरफा व्यापारिक कदमों, जैसे यूरोपीय संघ के "कार्बन सीमा समायोजन तंत्र" (CBAM), का भी कड़ा विरोध किया। भारत ने इसे अनुचित बताया और कहा कि यह जलवायु कार्रवाई की लागत गरीब देशों पर डालता है। लीना नंदन ने कहा कि ऐसे कदम अंतरराष्ट्रीय सहयोग को कमजोर करते हैं और विकासशील देशों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालते हैं।
वहीं पिछले महीने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने CBAM को "एकतरफा और मनमाना" बताया था। उन्होंने कहा था कि ऐसे कदम भारत के उद्योगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में असंतुलन पैदा कर सकते हैं।
'वैश्विक उत्सर्जन 2030 तक अपने चरम पर पहुंच सकता है'
दिल्ली में मौजूद थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के अनुसार, CBAM के तहत यूरोपीय संघ को निर्यात किए जाने वाले कार्बन-गहन सामानों पर 25% अतिरिक्त कर लगाया जाएगा। यह कर भारत की जीडीपी का 0.05% प्रतिनिधित्व करेगा। भारत ने यह भी कहा कि वैश्विक उत्सर्जन 2030 तक अपने चरम पर पहुंच सकता है। 2024 के एनडीसी सिंथेसिस रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के मुकाबले 2030 तक उत्सर्जन 2.6% कम हो सकता है। यह तभी संभव है जब सभी देश मिलकर काम करें। लेकिन इसके लिए विकासशील देशों को वित्त, तकनीक, और क्षमता निर्माण का सहयोग मिलना जरूरी है।