मैरी ने बीबीसी को बताया, "एक दिन सवेरे उठी तो मुझे सर्दी, जुकाम था। एक दो दिन में पता चला कि मुझे ब्रोन्काइटिस है।" "पहले सप्ताह भर तक गले में काफी खराश रही और तेज बुखार भी रहा। इसके बाद बुखार ठीक हुआ और फेफड़ों का इंफेक्शन भी खत्म हुआ और मेरी तबीयत सुधरने लगी। लेकिन करीब छह सप्ताह बाद भी गले से आवाज नहीं निकली।"
मैरी को कोई अंदाजा नहीं था कि उनके साथ क्या हा रहा है। उन्हें लगा कि कभी भी वो एक बार फिर से पहले की तरह बोलने लगेंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मैरी ने भी धीरे-धीरे ये मान लिया कि अब वो कभी बोल नहीं सकेंगी। मैरी कहती हैं, "पहले तो मैं काफी परेशान हो गई। लेकिन फिर बाद में मैंने हिम्मत से काम लिया। मुझे नहीं पता था कि मैं क्या करूंगी।"
मैरी केवल बोल नहीं सकती थीं ऐसा नहीं है, वो किसी तरह की आवाज भी निकाल नहीं सकती थीं। ना तो उनकी खांसी में किसी तरह की आवाज सुनाई देती थी ना ही उनकी हंसी में ही कोई आवाज थी। मैरी बताती हैं कि डॉक्टरों की जांच में भी कोई तथ्य सामने नहीं आया। वो कहती हैं, "पहले उन्होंने कहा कि मुझे लैरिन्जाइटिस है। फिर बाद में कहा कि हिस्टेरिकल म्यूटिज्म है।"
1990 के दशक में इस्तेमाल में आए शब्द हिस्टेरिकल म्यूटिज्म का अर्थ है जब शरीर में सब कुछ सामान्य रहता है लेकिन गले के तंत्र में कुछ गड़बड़ी आ जाती है। कई बार डॉक्टर मानते हैं कि व्यक्ति जानबूझ कर बात नहीं कर रहा है। मैरी कहती हैं, "ना तो मैं जिद्दी थी न ही मैं चुप रहना चाहती थी। मैं किसी से कुछ नहीं कह पा रही थी। फोन पर बात करना असंभव हो गया था और अगर मुसीबत में फंसी तो चीख तक नहीं सकती थी।"
वो कहती हैं कि एक बार अपने दोस्तों के साथ पहाड़ से नीचे आते हुए वो बीच में फंस गई थीं लेकिन किसी को मदद के लिए बुला भी नहीं पाई थीं। धीरे-धीरे उन्होंने सीखा कि उन्हें अधिक सावधानी बरतनी होगी।
एक बार स्कूल में टीचर ने मैरी को कॉयर (गायक दल) में शामिल कर लिया। सभी बच्चों का इस दल में शामिल होना अनिवार्य था लेकिन मैरी के लिए ये किसी प्रताड़ना से कम नहीं था। वो कहती हैं कि स्कूल में कईयों को उनकी मुश्किलों के बारे में कोई अंदाजा नहीं था। वो कहती हैं, "कई लोग मेरा मजाक उड़ाते थे। लेकिन आप हालातों से निपटना सीख जाते हैं।"
"मैं हमेशा एक नोटबुक और पेन अपने साथ रखती थी और लिख कर ही अपनी बात दूसरों तक पहुंचाती थी। मेरी कुछ सहेलियां लिप रीडिंग कर लेती थीं, लेकिन अक्सर मेरे लिए बात करना बेहद मुश्किल होता था।" "ना मैं रो सकती थी ना ही किसी बात पर अपना गुस्सा जाहिर कर सकती थी। मैं अपनी गुस्सा खुद पर निकालती थी और खुद को दोष देने लगी थी।"
"मैं एक कैथलिक नन के पास भी गई थी। उन्होंने कहा कि मैं पूरी तरह से स्वस्थ हूं और ऐसा कोई कुछ नहीं दिखता जो मुझे बात करने रोके। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने मेरी आवाज छीनकर मुझे सजा दी है।" मैरी कहती हैं कि नन ने स्थानीय पादरी से बात कर मेरे लिए प्रार्थना करने के लिए कहा। साथ ही उन्होंने मुझसे कहा कि मैं ईश्वर के सामने अपने पापों को स्वीकार कर उनके माफी मांगू।
वो कहती हैं, "लेकिन मैंने ऐसा करने से मना कर दिया क्योंकि मुझे पता था कि मैंने कोई पाप नहीं किया है।" "हम जिस दुनिया में रहते हैं वहां हम मानते हैं कि पादरी, नन और डॉक्टर कभी ग़लत बात नहीं कहते। ऐसे में उन पर संदेह करना मुश्किल था। मैं खुद से ही सवाल करने लगी थी।" "लोग मुझ पर हंसते थे और मजाक बनाते थे। कुछ मुझे शैतानी की बेटी कहते हैं। कभी-कभी ये सुन कर बहुत बुरा लगता था।"
मैरी बताती हैं कि अपने पाप स्वीकार करने से मना करने के कारण उन्हें चर्च में आने से रोक दिया गया। जब उनके मित्र चर्च में जा कर प्रार्थना करते वो बाहर बैठ कर अपने बारे में सोचती रहती। वो कहती हैं, "मुझे लगने लगा था कि सभी लोग सच ही कहते हैं प्रभु यीशू मुझे देखना नहीं चाहते और मुझ पर शैतान का साया है। मुझे लगने लगा कि मैं ईसाई ही नहीं हूं। जब आप कच्ची उम्र के होते हैं तो आप काफी कुछ सोचते रहते हैं।" मैरी बताती हैं कि स्कूल ही नहीं बल्कि पड़ोसियों को भी लगता था कि उन पर शैतान का साया है।
आवाज गुम होने के दो साल बाद मैरी अकेली हो गईं और परेशान रहने लगीं। 14 साल की उम्र में उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। यहां से उन्हें स्कूल नहीं भेजा गया बल्कि उन्हें मानसिक रोगियों के लिए बने एक अस्पताल में भेज दिया गया। "वो बुरे सपने का हकीकत बन जाने जैसा था। वहां ड्रग लेने वाले थे, मानसिक बीमारी से परेशान और हिंसा के शिकार लोग थे। मैं उन सबमें छोटी थी।"
"वहां कुछ मरीजों को बिजली के झटके दिए जाते थे जिनकी चीखों से आप दहल जाते थे। वो एक टॉर्चर चेंबर था।" मैरी अपनी हालत के लिए माता-पिता को भी जिम्मेदार मानने लगी थीं। एक दिन वो अस्पताल से भाग कर अपनी दोस्त के घर पहुंची और फिर वहां से अपने घर चली गईं। लेकिन अपने माता-पिता के साथ उनके रिश्ते बिगड़ चुके थे और वो किसी पर भरोसा नहीं कर पा रही थीं।
वो छह महीने तक सभी से दूर रहीं और धीर-धीरे अपनी जिंदगी के सच को स्वीकार कर आगे के रास्ते तलाशने लगीं। को अपनी मां के कॉफी की दुकान में काम करने लगीं और साइन लैंग्वेज (इशारों की भाषा) सीखने लगीं। धीरे-धीरे वो खुद को सामान्य महसूस करने लगीं उनकी जीवन पटरी पर लौटने लगा। फिर एक दिन एक चमत्कार हुआ जिसने मैरी का जीवन एक बार फिर बदल दिया।
जब मैरी 25 साल की थीं एक दिन अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई। वो कहती हैं, "मुझे खांसी होने लगी और मेरे मुंह से खून निकलने लगा। मुझे लगा कि मैं मरने वाली हूं। मैं जान पा रही थी कि मेरे गले में कुछ फंसा हुआ है।" "मेरे एक सहयोगी ने मुझे अस्पताल पहुंचाया जहां डॉक्टरों ने देखा कि मैरी के गले में बलगम का एक बड़ा टुकड़ा-सा कुछ फंसा है।"
"डॉक्टरों ने इस टुकड़े को बाहर निकाला और पता चला कि ये तीन पेन्स का एक सिक्का था।" मैरी कहती हैं कि उनके गले में ये सिक्का 1960 से फंसा हुआ था, लेकिन उन्हें इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि ये सिक्का उनके गले तक कैसे पहुंचा। ये सिक्का मैरी के गले में ध्वनि तंत्र के पास फंसा रह गया था जिस कारण उनके ध्वनितंत्र में कंपन होना बंद हो गया था। इसी कारण मैरी सालों तक कुछ बोल नहीं पाईं। बाद में सिक्का निकलने के बाद उनकी आवाज लौट आई।
मैरी कहती हैं, "सालों बाद मेरे गले से आवाज निकली तो मुझे यकीन नहीं हुआ। मुझे लगा कि कोई मेरे साथ मजाक कर रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि ये सिक्का मैरी मैकार्डी के गले में कुछ इस तरह फंसा था कि एक्स-रे मशीन से इसका पता लगाना मुश्किल था। आवाज वापस पाने के बाद मैरी ने सबसे पहले अपनी मां से फोन पर बात की। बाद में उन्होंने कॉयर बैंड में भी शामिल हुईं।
जुलाई 2019 में उनकी लिखी किताब "वॉयसलेस" (यानी आवाज के बिना) प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने अपने अनुभव के बारे में लिखा है। जो सिक्का मैरी के गले में फंसा था वो आज भी उसे अपने साथ रखती हैं। ये सिक्का उनके हाथ के ब्रेसलेट में लगा है।