पाकिस्तान सरकार की राय में आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के साथ उसकी बातचीत में प्रगति हो रही है। सत्ताधारी पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) की तरफ से यह दावा भी किया जा रहा है कि उसने जो नीति अपनाई, उसका परिणाम सामने आ रहा है। लेकिन कुछ जानकार ऐसी उम्मीद को बेबुनियाद मानते हैं। उनकी राय है कि टीटीपी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए बातचीत की आड़ भर ले रहा है।
बिलावल भुट्टो ने पीपीपी की एक बैठक में टीटीपी के साथ चल रही बातचीत की जानकारी दी। उसी बैठक में तीन सदस्यों की एक समिति बनाने का फैसला हुआ। समिति में कमर जमान कैरा, शेरी रहमान, और फरहतुल्ला बाबर को रखा गया है। टीटीपी के साथ पाकिस्तान सरकार की बातचीत की मध्यस्थता अफगानिस्तान में सत्ताधारी तालिबान कर रहा है। हाल में बातचीत में प्रगति के कारण दोनों पक्षों ने युद्धविराम की अवधि अनिश्चित काल तक के लिए बढ़ाने का फैसला किया था।
लेकिन सुरक्षा जानकारों के मुताबिक टीटीपी की मुख्य मांगों पर अभी बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ी है। इस महीने का आरंभ में टीटीपी ने अफगानिस्तान में अपने समर्थक कबीलों की बड़ी सभा आयोजित की थी। उसमें यह तय हुआ कि पाकिस्तान के प्रांत खैबर पख्तूनवा में संघ शासित कबीलाई इलाकों (फाटा) का विलय करने का फैसला जब तक पाकिस्तान सरकार नहीं पलटती है, तब तक अब आगे कोई और बात नहीं होगी।
टीटीपी से जारी वार्ता के सवाल पर ही बीते हफ्ते इस्लामाबाद स्थित थिंक टैंक पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज ने एक चर्चा आयोजित की। इसमें सांसदों, शिक्षाशास्त्रियों, पूर्व राजनयिकों, सेना के रिटायर्ड अधिकारियों और सुरक्षा एवं अफगान मामलों के विशेषज्ञों ने भाग लिया। इसमें सेना के कुछ अधिकारियों ने टीटीपी से वार्ता का विरोध किया। पूर्व फ्रंटियर कॉर्प्स के कोर कमांडर और इंस्पेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल तारिक खान ने कहा- ‘अगर किसी प्रतिबंधित गिरोह से बातचीत की जा रही है, तो यह सिर्फ उसके सरेंडर करने की शर्तों के बारे में होनी चाहिए।’
नेशनल काउंटर टेररिज्म अथॉरिटी के पूर्व राष्ट्रीय को-ऑर्डिनेटर एहसान ग़नी ने कहा कि टीटीपी के साथ शांति कायम करने में पाकिस्तान सफल होगा, इसकी संभावना कम है। अगर ऐसा कोई समझौता हुआ भी, तो वह आंख में धूल झोंकने वाला होगा और बहुत कम समय तक ही टिक पाएगा।