नए साल में यूरोपियन यूनियन (ईयू) के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर ईयू को एक प्रमुख विश्व शक्ति बने रहना है, तो उसे इस साल इन चुनौतियों का जवाब ढूंढना होगा। फिलहाल यूरोप के सामने सबसे बड़ी समस्या कोविड-19 महामारी से उबरने की है। टीकाकरण से वहां पैदा हुई उम्मीदें कोरोना वायरस के ओमिक्रॉन वैरिएंट से तेजी से हुए फैलाव ने तोड़ दी हैं।
रगटर्स यूनिवर्सिटी में यूरोपियन यूनियन पॉलिटिक्स विभाग प्रोफेसर आर डैनियल केलमेन ने अमेरिकी वेबसाइट सीएनएन से कहा- ‘ईयू में सभी फैसले बहुमत के आधार पर होते हैं। लेकिन सदस्य देश विदेश नीति संबंधी मामलों में अपने वीटो अधिकार को छोड़ने को लेकर अनिच्छुक रहते हैं।’ नतीजा यह है कि कई मामलों में ईयू के 27 सदस्य देश अलग-अलग नीति पर चलते हैं। इस वजह से ईयू के हस्तक्षेप करने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
विश्लेषकों का कहना है कि हंगरी और पोलैंड ने हाल के वर्षों में ईयू विरोधी नीतियां अपनाई हैं। इन दोनों देशों की सरकारें तानाशाही कायम करने की दिशा में चली हैं। केलमेन ने कहा- ‘इन देशों के रुख से ईयू के लिए नई समस्या खड़ी हुई है। रूस और चीन जैसे ईयू के प्रतिद्वंद्वी देश इन देशों से सीधे संबंध बनाने की राह पर चले हैं।’ लिथुआनिया के पूर्व प्रधानमंत्री आद्रियस कुबिलियस ने भी कहा है कि रूस ने ईयू के अंदर की इस समस्या का फायदा उठाया है।