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ईयू के सामने चुनौतियां: 2022 में यूरोपियन यूनियन को ढूंढने होंगे कई गंभीर सवालों के जवाब

Tue, 04 Jan 2022 07:23 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स

सार

विश्लेषकों का कहना है कि हंगरी और पोलैंड ने हाल के वर्षों में ईयू विरोधी नीतियां अपनाई हैं। इन दोनों देशों की सरकारें तानाशाही कायम करने की दिशा में चली हैं। केलमेन ने कहा- ‘इन देशों के रुख से ईयू के लिए नई समस्या खड़ी हुई है। रूस और चीन जैसे ईयू के प्रतिद्वंद्वी देश इन देशों से सीधे संबंध बनाने की राह पर चले हैं।’
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यूरोपीय संघ - फोटो : pixabay
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विस्तार
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नए साल में यूरोपियन यूनियन (ईयू) के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर ईयू को एक प्रमुख विश्व शक्ति बने रहना है, तो उसे इस साल इन चुनौतियों का जवाब ढूंढना होगा। फिलहाल यूरोप के सामने सबसे बड़ी समस्या कोविड-19 महामारी से उबरने की है। टीकाकरण से वहां पैदा हुई उम्मीदें कोरोना वायरस के ओमिक्रॉन वैरिएंट से तेजी से हुए फैलाव ने तोड़ दी हैं।

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ईयू के सामने ऊर्जा संकट लगातार बना हुआ है। पिछले साल गैस की कीमत तेजी से बढ़ी, जिससे राहत मिलने की कोई संभावना अभी भी नहीं दिख रही है। इसी बीच यूक्रेन पर रूस के हमले की आशंका ने यूरोपीय देशों को परेशान कर रखा है। विशेषज्ञों का कहना है कि साझा विदेश नीति अपनाने में ईयू के सदस्य देश नाकाम रहे हैं। यह ईयू की तमाम समस्याओं की जड़ है।

सभी फैसले बहुमत के आधार पर

रगटर्स यूनिवर्सिटी में यूरोपियन यूनियन पॉलिटिक्स विभाग प्रोफेसर आर डैनियल केलमेन ने अमेरिकी वेबसाइट सीएनएन से कहा- ‘ईयू में सभी फैसले बहुमत के आधार पर होते हैं। लेकिन सदस्य देश विदेश नीति संबंधी मामलों में अपने वीटो अधिकार को छोड़ने को लेकर अनिच्छुक रहते हैं।’ नतीजा यह है कि कई मामलों में ईयू के 27 सदस्य देश अलग-अलग नीति पर चलते हैं। इस वजह से ईयू के हस्तक्षेप करने की क्षमता कमजोर हो जाती है।

विश्लेषकों का कहना है कि हंगरी और पोलैंड ने हाल के वर्षों में ईयू विरोधी नीतियां अपनाई हैं। इन दोनों देशों की सरकारें तानाशाही कायम करने की दिशा में चली हैं। केलमेन ने कहा- ‘इन देशों के रुख से ईयू के लिए नई समस्या खड़ी हुई है। रूस और चीन जैसे ईयू के प्रतिद्वंद्वी देश इन देशों से सीधे संबंध बनाने की राह पर चले हैं।’ लिथुआनिया के पूर्व प्रधानमंत्री आद्रियस कुबिलियस ने भी कहा है कि रूस ने ईयू के अंदर की इस समस्या का फायदा उठाया है।

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नीदरलैंड्स से चुने गए यूरोपीय संसद की सदस्य सोफी इन्त वेल्द ने सीएनएन से कहा- ‘ईयू का गठन अभी जिस रूप में है, उसमें वह समस्याओं का सामना करने में अक्षम है। अंदरूनी मामलों में वह ऐसी पहल कर सकता है, जिसके अच्छे नतीजे निकलें- जैसा कोविड-19 महामारी के मामले में हुआ। लेकिन विदेशी मामलों में रुख पूरी तरह अलग-अलग देशों पर निर्भर करता है।’

अब नए साल में नजर जर्मनी पर है, जहां हाल ही में नई सरकार बनी है। आम राय है कि सोशल डेमोक्रेट्स, ग्रीन पार्टी और फ्री डेमोक्रेट्स की इस सरकार की नीतियों का ईयू पर गहरा प्रभाव होगा। जर्मनी ईयू के अंदर सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था फ्रांस है, जहां अप्रैल में चुनाव होना है। वहां राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का सीधा मुकाबला धुर दक्षिणपंथी ताकतों से है। अंदेशा यह है कि अगर धुर दक्षिणपंथी जीते, तो फ्रांस ईयू से निकलने की पहल कर सकता है। उस स्थिति में ईयू के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा। इस वर्ष ईयू की अध्यक्षता फ्रांस को मिली है। इसलिए फ्रांस की नीतियों पर ईयू की खास नजर होगी।

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