भारत-पाकिस्तान के बीच अगर परमाणु युद्ध हुआ तो कम से कम 12.5 करोड़ लोग मारे जाएंगे। इससे जलवायु परिवर्तन में और इजाफा होगा, जिससे बड़ी तबाही आ सकती है। यह चिंता जताई गई है अमेरिका के एक अध्ययन में। अध्ययन में कहा गया है कि जंग की स्थिति में दुनियाभर में भुखमरी छा सकती है।
अमेरिका में कोलोराडो बौल्डर यूनिवर्सिटी और रटगर्स यूनिवर्सिटी न्यू ब्रंसविक में प्रोफेसर और इस रिसर्च के सह लेखक एलन रोबोक ने बताया, ऐसी जंग से सिर्फ उन्हीं जगहों को नुकसान नहीं पहुंचेगा जहां बम गिरेंगे, बल्कि इससे पूरी दुनिया ही प्रभावित होगी। यानी दुनिया के किसी हिस्से में परमाणु बम गिराया जा सकता है।
अचानक होगा परमाणु हथियारों का इस्तेमाल
साल 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु जंग की आशंका जताते हुए इस नुकसान का आकलन किया गया है। इसमें कहा गया है कि कश्मीर को लेकर दोनों पड़ोसियों में कई बार जंग हो चुकी है। अध्ययन के मुताबिक, साल 2025 तक परमाणु हथियारों की क्षमता 15 किलोटन से लेकर कुछ सौ किलो टन तक हो सकती है।
साल 1945 में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा में गिराए गए परमाणु बम की क्षमता 15 किलोटन थी। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल अचानक ही होगा। इसके पीछे कोई तार्किक वजह नहीं होगी, जिससे वैश्विक नेताओं के बीच खटास देखने को मिलेगी। यह अध्ययन जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुआ है।
3.6 करोड़ टन राख से दुनिया में धुआं ही धुआं
अध्ययन में कहा गया है कि साल 2025 तक दोनों देशों के पास कुल मिलाकर 400 से 500 हथियार होंगे। जंग के वक्त इन हथियारों के इस्तेमाल से धुएं के गुबार के रूप में छोटे-छोटे काले कार्बन कणों वाली 1.6 से 3.6 करोड़ टन कालिख वाली राख निकल सकती है।
यह तेजी से हमारे वातावरण में छा जाएगी और कुछ ही हफ्तों में पूरी दुनिया में फैल जाएगी। यह राख सौर विकिरण (सोलर रेडिएशन) को भी सोख लेगी और हवा को गर्म बना देगी और दुनियाभर में धुआं ही धुआं नजर आएगा।
पूरी दुनिया में बारिश पर पड़ेगा बड़ा असर
वातावरण में राख छाने के बाद धरती पर पहुंचने वाली सूर्य की रोशनी की मात्रा में 20 से 35 फीसदी की कमी आएगी, जिससे धरती की सतह का तापमान दो से पांच डिग्री सेल्सियस तक घट जाएगा। इतना ही नहीं, दुनियाभर में होने वाली बारिश में भी 15 से 30 फीसदी की कमी देखने को मिलेगी, जिसका इंसान की जिंदगी और फसलों पर व्यापक असर पड़ेगा।
परमाणु जंग के असर से निजात में लगेंगे 10 साल
अध्ययन के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर पेड़-पौधों का विकास 15 से 30 प्रतिशत तक थम जाएगा और महासागरों से होने वाले उत्पादनों में भी 5 से 15 फीसदी तक कमी हो जाएगी। इन दुष्प्रभावों से निजात मिलने में कम से कम 10 साल लगेंगे। इस दौरान ऊपरी वातावरण में धुआं मौजूद रहेगा।