आइसलैंड का 700 साल पुराना ओकजोकुल ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलकर पूरी तरह खत्म हो गया है। वैज्ञानिकों का दावा किया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खत्म होने वाला यह दुनिया का पहला ग्लेशियर है।
साथ ही वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर हम जलवायु परिवर्तन को लेकर कुछ नहीं करेंगे तो इस क्षेत्र में स्थित अन्य ग्लेशियरों का भी यही हाल होगा। इस साल दुनिया भर में जुलाई का महीना सबसे गर्म रहा था। रविवार को ग्लेशियर की याद में आइसलैंड के लोगों ने शोक मनाया।
सरकार ने उसके नाम की कांस्य की पट्टिका बनाकर स्थापित की। प्रधानमंत्री कैटरीन जोकोबस्दोतियर के साथ मंत्रियों ने ग्लेशियर को श्रद्धांजलि भी दी। पीएम ने शोक संदेश में कहा कि 'जो हुआ वह ठीक नहीं है। हमें एकजुट होकर जलवायु परिवर्तन को लेकर जरूरी कदम उठाने की जरूरत है।' प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार की आयुक्त मैरी रॉबनसन और स्थानीय लोग मौजूद रहें।
पट्टिका शिलालेख पर लिखा है कि यह "भविष्य के लिए एक पत्र" है, और इसका उद्देश्य ग्लेशियरों की गिरावट और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। पट्टिका में आगे लिखा है कि अगले 200 वर्षों में हमारे सभी ग्लेशियर इस तरह पिघल जाएंगे। यह स्मारक आपको याद दिलाएगा कि हम जानते हैं कि क्या हो रहा है और क्या करने की आवश्यकता है।
दावा किया गया है कि मई में 415 पीपीएम की कार्बन डाई ऑक्साइड पर्यावरण में दर्ज की गई। साथ ही यह भी कहा गया है कि जल्द ही अगर कदम नहीं उठाए गए तो 400 ग्लेशियर इसी तरह खत्म हो सकते हैं।
आइसलैंड में हर साल 11 अरब टन बर्फ पिघल रही है जो समुद्र का जलस्तर भी बढ़ा रही है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर के बताया है कि गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया तो अगले 100 साल में दुनिया के आधे से अधिक ग्लेशियर पिघल जाएंगे।
ओकजोकुल ग्लेशियर आइसलैंड के पश्चिमी सब-आर्कटिक हिस्से में ओक ज्वालामुखी पर स्थित था। पिछले कुछ सालों से यह तेजी से पिघल रहा था। लिहाजा इसके खत्म होने की आशंका जताई जा रही थी।
14 सितंबर 1986 को इसकी सैटेलाइट इमेज जारी की गई थी। 1901 में ग्लेशियर करीब 38 वर्ग फीट किमी में फैला था, जो 118 साल में घटकर एक वर्ग किमी से भी कम बचा है। इसी माह एक अगस्त को जारी की गई तस्वीर में वह न के बराबर दिखाई दिया।